समउ जानि गुर आयसु दीन्हा
समउ जानि गुर आयसु दीन्हा
चौपाई ४, दोहा ३४७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
समउ जानि गुर आयसु दीन्हा। पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा॥ सुमिरि संभु गिरिजा गनराजा। मुदित महीपति सहित समाजा॥ ४ ॥
अर्थ
[प्रवेश का] समय जानकर गुरु वसिष्ठजी ने आज्ञा दी। तब रघुकुलमणि महाराज दशरथजी ने शिवजी, पार्वतीजी और गणेशजी का स्मरण करके समाज सहित आनन्दित होकर नगर में प्रवेश किया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बारात का अयोध्या लौटना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३४७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विवाह के बाद बारात का नववधुओं सहित अयोध्या लौटना और नगर में आनंदोत्सव का वर्णन है।
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बारात का अयोध्या लौटना