अंगदजी का लंका जाना और रावण की सभा में अंगद-रावण-संवाद

अंगदजी दूत बनकर लंका की सभा में पहुँचते हैं और निर्भय वचन कहते हैं। वे रावण को अंतिम बार सीताजी को लौटाने और श्रीरामजी की शरण ग्रहण करने का अवसर देते हैं।

लंकाकाण्ड · प्रकरण ८ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

बंदि चरन उर धरि प्रभुताई। अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई॥ प्रभु प्रताप उर सहज असंका। रन बाँकुरा बालिसुत बंका॥ १ ॥

अर्थ:

चरणों की वन्दना करके और भगवान् की प्रभुता हृदय में धरकर अंगद सबको सिर नवाकर चले। प्रभु के प्रताप को हृदय में धारण किये हुए रणबाँकुरे वीर बालिपुत्र स्वाभाविक ही निर्भय हैं।

चौपाई

पुर पैठत रावन कर बेटा। खेलत रहा सो होइ गै भेटा॥ बातहिं बात करष बढ़ि आई। जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई॥ २ ॥

अर्थ:

लंका में प्रवेश करते ही रावण के पुत्र से भेंट हो गयी, जो वहाँ खेल रहा था। बातों-ही-बातों में झगड़ा बढ़ गया। [क्योंकि] दोनों ही अतुलनीय बलवान् थे और फिर दोनों की युवावस्था थी।

चौपाई

तेहिं अंगद कहुँ लात उठाई। गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई॥ निसिचर निकर देखि भट भारी। जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी॥ ३ ॥

अर्थ:

उसने अंगद पर लात उठायी। अंगद ने [वही] पैर पकड़कर उसे घुमाकर जमीन पर दे पटका (मार गिराया)। राक्षस के समूह भारी योद्धा देखकर जहाँ-तहाँ [भाग] चले, वे डर के मारे पुकार भी न मचा सके।

चौपाई

एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं॥ भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहिं जारी॥ ४ ॥

अर्थ:

एक-दूसरे को मर्म (असली बात) नहीं बतलाते, उस (रावण के पुत्र) का वध समझकर सब चुप मार कर रह जाते हैं। [रावण-पुत्र की मृत्यु जानकर और राक्षसों को भय के मारे भागते देखकर] नगर भर में कोलाहल मच गया कि जिसने लंका जलायी थी, वही वानर फिर आ गया है।

चौपाई

अब धौं कहा करिहि करतारा। अति सभीत सब करहिं बिचारा॥ बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई। जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई॥ ५ ॥

अर्थ:

सब अत्यन्त भयभीत होकर विचार करने लगे कि विधाता अब न जाने क्या करेगा। वे बिना पूछे ही अंगद को [रावण के दरबार की] राह बता देते हैं। जिसे ही वे देखते हैं वही डर के मारे सूख जाता है।

दोहा

गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज। सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज॥ १८ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी के चरणकमलों का स्मरण करके अंगद रावण की सभा के द्वार पर गये। और वे धीर, वीर और बल की राशि अंगद सिंह की-सी ऐंड़ (शान) से इधर-उधर देखने लगे।

दोहा 19 के अंतर्गत
चौपाई

तुरत निसाचर एक पठावा। समाचार रावनहि जनावा॥ सुनत बिहँसि बोला दससीसा। आनहु बोलि कहाँ कर कीसा॥ १ ॥

अर्थ:

तुरंत ही उन्होंने एक राक्षस को भेजा और रावण को अपने आने का समाचार सूचित किया। सुनते ही रावण हँसकर बोला--बुला लाओ, [देखें] कहाँ का बंदर है।

चौपाई

आयसु पाइ दूत बहु धाए। कपिकुंजरहि बोलि लै आए॥ अंगद दीख दसानन बैसें। सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें॥ २ ॥

अर्थ:

आज्ञा पाकर बहुत-से दूत दौड़े और वानरों में हाथी के समान अंगद को बुला लाये। अंगद ने रावण को ऐसे बैठे हुए देखा जैसे कोई प्राणयुक्त (सजीव) काजल का पहाड़ हो !

चौपाई

भुजा बिटप सिर सृंग समाना। रोमावली लता जनु नाना॥ मुख नासिका नयन अरु काना। गिरि कंदरा खोह अनुमाना॥ ३ ॥

अर्थ:

भुजाएँ वृक्षों के और सिर पर्वतों के शिखरों के समान हैं। रोमावली मानो बहुत-सी लताएँ हैं। मुँह, नाक, नेत्र और कान पर्वत की कन्दराओं और खोहों के बराबर हैं।

चौपाई

गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा। बालितनय अतिबल बाँकुरा॥ उठे सभासद कपि कहुँ देखी। रावन उर भा क्रोध बिसेषी॥ ४ ॥

अर्थ:

अत्यन्त बलवान् बाँके वीर बालिपुत्र अंगद सभामें गये, वे मन में जरा भी नहीं झिझके। अंगद को देखते ही सब सभासद् उठ खड़े हुए। यह देखकर रावण के हृदय में बड़ा क्रोध हुआ।

दोहा

जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ। राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ॥ १९ ॥

अर्थ:

जैसे मतवाले हाथियों के झुंड में सिंह [निःशल्क होकर] चला जाता है, वैसे ही श्रीरामजी के प्रताप का हृदय में स्मरण करके वे [निर्भय] सभामें सिर नवाकर बैठ गये।

दोहा 20 के अंतर्गत
चौपाई

कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर॥ मम जनकहि तोहि रही मिताई। तव हित कारन आयउँ भाई॥ १ ॥

अर्थ:

रावण ने कहा--अरे बंदर! तू कौन है? [अंगद ने कहा--] हे दशग्रीव! मैं श्रीरघुबीर का दूत हूँ। मेरे पिता से और तुम से मित्रता थी। इसलिये हे भाई! मैं तुम्हारी भलाई के लिये ही आया हूँ।

चौपाई

उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती॥ बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा॥ २ ॥

अर्थ:

तुम्हारा उत्तम कुल है, पुलस्त्य ऋषि के तुम पौत्र हो। शिवजी की और ब्रह्माजी की तुमने बहुत प्रकार से पूजा की है। उनसे वर पाये हो और सब काम सिद्ध किये हैं। लोकपालों और सब राजाओं को तुमने जीत लिया है।

चौपाई

नृप अभिमान मोह बस किंबा। हरि आनिहु सीता जगदंबा॥ अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा। सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा॥ ३ ॥

अर्थ:

राजमद से या मोहवश तुम जगज्जननी सीताजी को हर लाये हो। अब तुम मेरे शुभ वचन (मेरी हितभरी सलाह) सुनो! [उसके अनुसार चलने से] प्रभु श्रीरामजी तुम्हारे सब अपराध क्षमा कर देंगे।

चौपाई

दसन गहहु तृन कंठ कुठारी। परिजन सहित संग निज नारी॥ सादर जनकसुता करि आगें। एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें॥ ४ ॥

अर्थ:

दाँतों में तिनका दबाओ, गले में कुल्हाड़ी डालो और परिजनों सहित अपनी नारी को साथ लेकर, आदरपूर्वक जनकसुता को आगे करके, इस प्रकार सब भय छोड़कर चलो--।

दोहा

प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि। आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि॥ २० ॥

अर्थ:

और 'हे शरणागत के पालन करनेवाले रघुवंशमणि श्रीरामजी! मेरी रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।' [इस प्रकार आर्त प्रार्थना करो।] आर्त पुकार सुनते ही प्रभु तुमको निर्भय कर देंगे।

दोहा 21 के अंतर्गत
चौपाई

रे कपिपोत बोलु संभारी। मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी॥ कहु निज नाम जनक कर भाई। केहि नातें मानिऐ मिताई॥ १ ॥

अर्थ:

[रावण ने कहा--] अरे बंदर के बच्चे! सँभालकर बोल! मूर्ख! मुझ देवताओं के शत्रु को तूने जाना नहीं? अरे भाई! अपना और अपने बाप का नाम तो बता। किस नाते से मित्रता मानता है?

चौपाई

अंगद नाम बालि कर बेटा। तासों कबहुँ भई ही भेटा॥ अंगद बचन सुनत सकुचाना। रहा बालि बानर मैं जाना॥ २ ॥

अर्थ:

[अंगद ने कहा--] मेरा नाम अंगद है, मैं बालि का पुत्र हूँ। उनसे कभी तुम्हारी भेंट हुई थी? अंगद का वचन सुनते ही रावण कुछ सकुचा गया [और बोला--] हाँ, मैं जान गया (मुझे याद आ गया), बालि नाम का एक बंदर था।

चौपाई

अंगद तहीं बालि कर बालक। उपजेहु बंस अनल कुल घालक॥ गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु। निज मुख तापस दूत कहायहु॥ ३ ॥

अर्थ:

अरे अंगद! तू ही बालि का लड़का है? अरे कुलनाशक! तू तो अपने कुलरूपी बाँस के लिये अग्निरूप ही पैदा हुआ! गर्भ में ही क्यों न नष्ट हो गया? तू व्यर्थ ही पैदा हुआ जो अपने ही मुँह से तपस्वियों का दूत कहलाया!

चौपाई

अब कहु कुसल बालि कहँ अहई। बिहँसि बचन तब अंगद कहई॥ दिन दस गएँ बालि पहिं जाई। बूझेहु कुसल सखा उर लाई॥ ४ ॥

अर्थ:

अब बालि की कुशल तो बता, वह [आजकल] कहाँ है? तब अंगद ने हँसकर कहा-दस (कुछ) दिन बीतने पर [स्वयं ही] बालि के पास जाकर, अपने मित्र को हृदय से लगाकर, उसी से कुशल पूछ लेना।

चौपाई

राम बिरोध कुसल जसि होई। सो सब तोहि सुनाइहि सोई॥ सुनु सठ भेद होइ मन ताकें। श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाकें॥ ५ ॥

अर्थ:

श्रीरामजी से विरोध करने पर जैसी कुशल होती है, वह सब तुमको वे सुनावेंगे। हे मूर्ख! सुन, भेद उसी के मन में पड़ सकता है, जिसके हृदय में श्रीरघुबीर न हों।

दोहा

हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस। अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस॥ २१ ॥

अर्थ:

सच है, मैं तो कुल का नाश करनेवाला हूँ और हे रावण! तुम कुल के रक्षक हो। अंधे-बहरे भी ऐसी बात नहीं कहते, तुम्हारे तो बीस नेत्र और बीस कान हैं!

दोहा 22 के अंतर्गत
चौपाई

सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई॥ तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा॥ १ ॥

अर्थ:

शिव, ब्रह्मा [ आदि ] देवता और मुनियों के समुदाय जिनके चरणों की सेवा [ करना] चाहते हैं, उनका दूत होकर मैंने कुल को डुबो दिया? अरे ऐसी बुद्धि होने पर भी तुम्हारा हृदय फट नहीं जाता?

चौपाई

सुनि कठोर बानी कपि केरी। कहत दसानन नयन तरेरी॥ खल तव कठिन बचन सब सहऊँ। नीति धर्म मैं जानत अहऊँ॥ २ ॥

अर्थ:

वानर (अंगद) की कठोर वाणी सुनकर रावण आँखें तरेरकर (तिरछी करके) बोला--अरे दुष्ट! मैं तेरे सब कठोर वचन इसीलिये सह रहा हूँ कि मैं नीति और धर्म को जानता हूँ (उन्हींकी रक्षा कर रहा हूँ)।

चौपाई

कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी॥ देखी नयन दूत रखवारी। बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी॥ ३ ॥

अर्थ:

अंगद ने कहा--तुम्हारी धर्मशीलता मैंने भी सुनी है। [वह यह कि] तुमने परायी स्त्री की चोरी की है! और दूत की रखवारी की बात तो अपनी आँखों से देख ली। ऐसे धर्म के ब्रत को धारण करनेवाले तुम डूबकर मर नहीं जाते!

चौपाई

कान नाक बिनु भगिनि निहारी। छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी॥ धर्मसीलता तव जग जागी। पावा दरसु हमहुँ बड़भागी॥ ४ ॥

अर्थ:

नाक-कान से रहित बहिन को देखकर तुमने धर्म विचार कर ही तो क्षमा कर दिया था! तुम्हारी धर्मशीलता जग-जाहिर है। मैं भी बड़ा भाग्यवान्‌ हूँ, जो मैंने तुम्हारा दर्शन पाया ?।

दोहा

जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु। लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु॥ २२ (क) ॥

अर्थ:

[रावण ने कहा--] अरे जड़ जन्तु वानर! व्यर्थ बक-बक न कर; आरे मूर्ख! मेरी भुजाएँ तो देख। ये सब लोकपालों के विशाल बलरूपी चन्द्रमाको ग्रसने के लिये राहु हैं।

दोहा

पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास। सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास॥ २२ (ख) ॥

अर्थ:

फिर [तूने सुना ही होगा कि] आकाशरूपी तालाब में मेरी भुजाओंरूपी कमलों पर बसकर शिवजी सहित कैलास हंस के समान शोभा को प्राप्त हुआ था!।

दोहा 23 के अंतर्गत
चौपाई

तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद। मो सन भिरिहि कवन जोधा बद॥ तव प्रभु नारि बिरहँ बलहीना। अनुज तासु दुख दुखी मलीना॥ १ ॥

अर्थ:

अरे अंगद! सुन; तेरी सेना में बता, ऐसा कौन योद्धा है जो मुझसे भिड़ सकेगा। तेरा मालिक तो स्त्री के वियोग में बलहीन हो रहा है। और उसका छोटा भाई उसी के दुःख से दुःखी और उदास है।

चौपाई

तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ। अनुज हमार भीरु अति सोऊ॥ जामवंत मंत्री अति बूढ़ा। सो कि होइ अब समरारूढ़ा॥ २ ॥

अर्थ:

तुम और सुग्रीव, दोनों [नदी] तट के वृक्ष हो। [रहा] मेरा छोटा भाई विभीषण, [सो] वह भी बड़ा डरपोक है। मन्त्री जाम्बवान् बहुत बूढ़ा है। वह अब लड़ाई में क्या चढ़ (उद्यत हो) सकता है ?

चौपाई

सिल्पिकर्म जानहिं नल नीला। है कपि एक महा बलसीला॥ आवा प्रथम नगरु जेहिं जारा। सुनत बचन कह बालिकुमारा॥ ३ ॥

अर्थ:

नल-नील तो शिल्प-कर्म जानते हैं (वे लड़ना क्या जानें ?)। हाँ, एक वानर जरूर महान् बलवान् है, जो पहले आया था, और जिसने नगर जला दिया था। यह वचन सुनते ही बालिपुत्र अंगद ने कहा--।

चौपाई

सत्य बचन कहु निसिचर नाहा। साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा॥ रावन नगर अल्प कपि दहई। सुनि अस बचन सत्य को कहई॥ ४ ॥

अर्थ:

हे राक्षसराज! सच्ची बात कहो! क्या उस वानर ने सचमुच तुम्हारा नगर जला दिया? रावण [जैसे जगद्विजयी योद्धा] का नगर एक छोटे-से वानर ने जला दिया। ऐसे वचन सुनकर उन्हें सत्य कौन कहेगा ?

चौपाई

जो अति सुभट सराहेहु रावन। सो सुग्रीव केर लघु धावन॥ चलइ बहुत सो बीर न होई। पठवा खबरि लेन हम सोई॥ ५ ॥

अर्थ:

हे रावण! जिसको तुमने बहुत बड़ा योद्धा कहकर सराहा है, वह तो सुग्रीव का एक छोटा-सा दौड़कर चलनेवाला हरकारा है। वह बहुत चलता है, वीर नहीं है। उसको तो हमने [केवल] खबर लेने के लिये भेजा था।

दोहा

सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ। फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ॥ २३ (क) ॥

अर्थ:

क्या सचमुच ही उस वानर ने प्रभु की आज्ञा पाये बिना ही तुम्हारा नगर जला डाला? मालूम होता है, इसी डर से वह लौटकर सुग्रीव के पास नहीं गया और कहीं छिप रहा!

दोहा

सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह। कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह॥ २३ (ख) ॥

अर्थ:

हे रावण! तुम सब सत्य ही कहते हो, मुझे सुनकर कुछ भी क्रोध नहीं है। सचमुच हमारी सेना में कोई भी ऐसा नहीं है जो तुमसे लड़ने में शोभा पाए।

दोहा

प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि। जौं मृगपति बध मेडुकन्हि भल कि कहइ कोउताहि॥ २३ (ग) ॥

अर्थ:

प्रीति और बैर बराबरीवाले से ही करना चाहिये, नीति ऐसी ही है। सिंह यदि मेढकों को मारे, तो क्या उसे कोई भला कहेगा ?

दोहा

जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि बधें बड़ दोष। तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष॥ २३ (घ) ॥

अर्थ:

यद्यपि तुम्हें मारने में श्रीरामजी की लघुता है और बड़ा दोष भी है, तथापि हे रावण! सुनो, क्षत्र जाति का क्रोध बड़ा कठिन होता है।

दोहा

बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस। प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस॥ २३ (ङ) ॥

अर्थ:

वक्रोक्ति रूपी धनुष से वचन रूपी बाण मारकर अंगद ने शत्रु का हृदय जला दिया। वीर रावण उन बाणों को मानो प्रत्युत्तर रूपी सँड़सियों से निकाल रहा है।

दोहा

हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक। जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक॥ २३ (च) ॥

अर्थ:

तब रावण हँसकर बोला--बंदर में यह एक बड़ा गुण है कि जो उसे पालता है, उसका वह अनेकों उपायों से भला करने की चेष्टा करता है।

दोहा 24 के अंतर्गत
चौपाई

धन्य कीस जो निज प्रभु काजा। जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा॥ नाचि कूदि करि लोग रिझाई। पति हित करइ धर्म निपुनाई॥ १ ॥

अर्थ:

बंदर को धन्य है, जो अपने मालिक के लिये लाज छोड़कर जहाँ-तहाँ नाचता है। नाच-कूदकर, लोगों को रिझाकर, मालिक का हित करता है। यह उसके धर्म की निपुणता है।

चौपाई

अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती॥ मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउँ नहिं काना॥ २ ॥

अर्थ:

है अंगद! तेरी जाति स्वामिभक्त है। [फिर भला] तू अपने मालिक के गुण इस प्रकार कैसे न बखानेगा ? मैं गुणग्राहक (गुणों का आदर करनेवाला) और परम सुजान (समझदार) हूँ, इसीसे तेरी जली-कटी बक-बक पर कान (ध्यान) नहीं देता।

चौपाई

कह कपि तव गुन गाहकताई। सत्य पवनसुत मोहि सुनाई॥ बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा। तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा॥ ३ ॥

अर्थ:

अंगद ने कहा-तुम्हारी सच्ची गुणग्राहकता तो मुझे हनुमानजी ने सुनायी थी। उसने अशोकवन को विध्वंस करके, तुम्हारे पुत्र को मारकर नगर को जला दिया था। तो भी [तुमने अपनी गुणग्राहकता के कारण यही समझा कि] उसने तुम्हारा कुछ भी अपकार नहीं किया।

चौपाई

सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई॥ देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा॥ ४ ॥

अर्थ:

तुम्हारा वही सुन्दर स्वभाव विचारकर, हे दशकंधर ! मैंने कुछ धृष्टता की है। हनुमान ने जो कुछ कहा था, उसे आकर मैंने प्रत्यक्ष देख लिया कि तुम्हें न लज्जा है, न क्रोध है और न चिढ़ है।

चौपाई

जौं असि मति पितु खाए कीसा। कहि अस बचन हँसा दससीसा॥ पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही। अबहीं समुझि परा कछु मोही॥ ५ ॥

अर्थ:

[रावण बोला--] अरे वानर! जब तेरी ऐसी बुद्धि है तभी तो तू बाप को खा गया। ऐसा वचन कहकर रावण हँसा। अंगद ने कहा--पिता को खाकर फिर तुमको भी खा डालता। परन्तु अभी तुरंत कुछ और ही बात मेरी समझ में आ गयी !

चौपाई

बालि बिमल जस भाजन जानी। हतउँ न तोहि अधम अभिमानी॥ कहु रावन रावन जग केते। मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते॥ ६ ॥

अर्थ:

अरे नीच अभिमानी! बाली के निर्मल यश का पात्र जानकर तुम्हें मैं नहीं मारता। रावण! यह तो बता कि जगत में कितने रावण हैं ? मैंने जितने रावण अपने कानों से सुन रखे हैं, उन्हें सुन--।

चौपाई

बलिहि जितन एक गयउ पताला। राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला॥ खेलहिं बालक मारहिं जाई। दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई॥ ७ ॥

अर्थ:

एक रावण तो बली को जीतने पाताल में गया था, तब बच्चों ने उसे घुड़साल में बाँध रखा। बालक खेलते थे और जा-जाकर उसे मारते थे। बली को दया लगी, तब उन्होंने उसे छुड़ा दिया।

चौपाई

एक बहोरि सहसभुज देखा। धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा॥ कौतुक लागि भवन लै आवा। सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा॥ ८ ॥

अर्थ:

फिर एक रावण को सहस्रबाहु ने देखा, और उसने दौड़कर उसको एक विशेष प्रकार के जन्तु की तरह [समझकर] पकड़ लिया। तमाशे के लिये वह उसे घर ले आया। तब पुलस्त्य मुनि ने जाकर उसे छुड़ाया।

दोहा

एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि कीं काँख। इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख॥ २४ ॥

अर्थ:

एक रावण की बात कहने में तो मुझे बड़ा संकोच हो रहा है--वह [बहुत दिनों तक] बालि की काँख में रहा था। इनमें से तुम कौन-से रावण हो ? खीझना छोड़कर सच-सच बताओ।

दोहा 25 के अंतर्गत
चौपाई

सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला॥ जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई॥ १ ॥

अर्थ:

[रावण ने कहा--] ओरे मूर्ख! सुन, मैं वही बलवान् रावण हूँ जिसकी भुजाओं की लीला (करामात) कैलास पर्वत जानता है। जिसकी शूरता उमापति महादेवजी जानते हैं, जिन्हें अपने सिररूपी पुष्प चढ़ा-चढ़ाकर मैंने पूजा था।

चौपाई

सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी॥ भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला॥ २ ॥

अर्थ:

सिररूपी कमलों को अपने हाथों से उतार-उतारकर मैंने अगणित बार त्रिपुरारि शिवजी की पूजा की है। अरे मूर्ख ! मेरी भुजाओं का पराक्रम दिक्पाल जानते हैं, जिनके हृदय में वह आज भी चुभ रहा है।

चौपाई

जानहिं दिग्गज उर कठिनाई। जब जब भिरउँ जाइ बरिआई॥ जिन्ह के दसन कराल न फूटे। उर लागत मूलक इव टूटे॥ ३ ॥

अर्थ:

दिग्गज (दिशाओं के हाथी) मेरी छाती की कठोरता को जानते हैं। जिनके भयानक दाँत, जब-जब जाकर मैं उनसे जबरदस्ती भिड़ा, मेरी छाती में कभी नहीं फूटे (अपना चिह्न भी नहीं बना सके), बल्कि मेरी छाती से लगते ही वे मूली की तरह टूट गये।

चौपाई

जासु चलत डोलति इमि धरनी। चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी॥ सोइ रावन जग बिदित प्रतापी। सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी॥ ४ ॥

अर्थ:

जिसके चलते समय पृथ्वी इस प्रकार हिलती है जैसे मतवाले हाथी के चढ़ते समय छोटी नाव! मैं वही जगत्प्रसिद्ध प्रतापी रावण हूँ। अरे झूठी बकवाद करने वाले ! क्या तूने मुझको कानों से कभी नहीं सुना ?

दोहा

तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान। रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान॥ २५ ॥

अर्थ:

उस (महान प्रतापी और जगत्प्रसिद्ध) रावण को (मुझे) तू छोटा कहता है और मनुष्य की बड़ाई करता है? अरे दुष्ट, असभ्य, तुच्छ बंदर! अब मैंने तेरा ज्ञान जान लिया।

दोहा 26 के अंतर्गत
चौपाई

सुनि अंगद सकोप कह बानी। बोलु सँभारि अधम अभिमानी॥ सहसबाहु भुज गहन अपारा। दहन अनल सम जासु कुठारा॥ १ ॥

अर्थ:

रावण के ये वचन सुनकर अंगद क्रोध सहित वचन बोले--अरे नीच अभिमानी! सँभालकर (सोच-समझकर) बोल। जिनका फरसा सहस्रबाहु की भुजाओं रूपी अपार वन को जलाने के लिए अग्नि के समान था।

चौपाई

जासु परसु सागर खर धारा। बूड़े नृप अगनित बहु बारा॥ तासु गर्ब जेहि देखत भागा। सो नर क्यों दससीस अभागा॥ २ ॥

अर्थ:

जिनके फरसे रूपी सागर की तीक्ष्ण धारामें अनगिनत राजा अनेकों बार डूब गये, उन परशुरामजीका गर्व जिन्हें देखते ही भाग गया, अरे अभागे दशशीश! वे मनुष्य क्योंकर हैं ?।

चौपाई

राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा॥ पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा। अन्न दान अरु रस पीयूषा॥ ३ ॥

अर्थ:

क्यों रे मूर्ख उद्दण्ड! श्रीरामचन्द्रजी मनुष्य हैं? कामदेव भी क्या धनुर्धारी है? और नदी फिर गंगा है? कामधेनु क्या पशु है? और कल्पवृक्ष क्या पेड़ है? अन्न भी क्या दान है? और अमृत क्या रस है ?।

चौपाई

बैनतेय खग अहि सहसानन। चिंतामनि पुनि उपल दसानन॥ सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा। लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा॥ ४ ॥

अर्थ:

गरुड़जी क्या पक्षी हैं? शेषजी क्या सर्प हैं? अरे रावण! चिन्तामणि भी क्या पत्थर है ? अरे ओ मूर्ख ! सुन, वैकुण्ठ भी क्या लोक है? और श्रीरघुनाथजी की अखण्ड भक्ति क्या [और लाभों जैसा ही] लाभ है ?।

दोहा

सेन सहित तव मान मथि बन उजारि पुर जारि। कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि॥ २६ ॥

अर्थ:

सेनासमेत तेरा मान मथकर, अशोकवन को उजाड़कर, नगर को जलाकर और तेरे पुत्र को मारकर जो लौट गये [तू उनका कुछ भी न बिगाड़ सका], क्यों रे दुष्ट! वे हनुमानजी क्या वानर हैं ?।

दोहा 27 के अंतर्गत
चौपाई

सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई॥ जौं खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही॥ १ ॥

अर्थ:

अरे रावण! चतुराई (कपट) छोड़कर सुन। कृपा के समुद्र श्रीरघुनाथजी का तू भजन क्यों नहीं करता ? ओरे दुष्ट ! यदि तू श्रीरामजी का बैरी हुआ तो तुझे ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे।

चौपाई

मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला॥ तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें॥ २ ॥

अर्थ:

हे मूढ़! व्यर्थ गाल न मार (डींग न हाँक)। श्रीरामजी से वैर करने पर तेरा ऐसा हाल होगा कि तेरे सिर-समूह श्रीरामजी के बाण लगते ही वानरों के आगे पृथ्वी पर पड़ेंगे।

चौपाई

ते तव सिर कंदुक सम नाना। खेलिहहिं भालु कीस चौगाना॥ जबहिं समर कोपिहि रघुनायक। छुटिहहिं अति कराल बहु सायक॥ ३ ॥

अर्थ:

और रीछ-वानर तेरे उन गेंद के समान अनेकों सिरों से चौगान खेलेंगे। जब श्रीरघुनाथजी युद्ध में कोप करेंगे और उनके अत्यन्त तीक्ष्ण बहुत-से बाण छूटेंगे,।

चौपाई

तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा। अस बिचारि भजु राम उदारा॥ सुनत बचन रावन परजरा। जरत महानल जनु घृत परा॥ ४ ॥

अर्थ:

तब क्या तेरा ऐसा गाल चलेगा ? ऐसा विचारकर उदार (कृपालु) श्रीरामजी को भज। अंगद के ये वचन सुनकर रावण बहुत अधिक जल उठा। मानो जलती हुई प्रचण्ड अग्नि में घी पड़ गया हो।

दोहा

कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि। मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि॥ २७ ॥

अर्थ:

कुम्भकर्ण-सा मेरा भाई है, इन्द्र का शत्रु सुप्रसिद्ध मेघनाद मेरा पुत्र है! और मेरा पराक्रम तो तूने सुना ही नहीं कि मैंने सम्पूर्ण जड-चेतन जगत् को जीत लिया है !।

दोहा 28 के अंतर्गत
चौपाई

सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई॥ नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा॥ १ ॥

अर्थ:

रे दुष्ट! वानरों की सहायता जोड़कर राम ने समुद्र बाँध लिया; बस, यही उसकी प्रभुता है। समुद्र को तो अनेकों पक्षी भी लाँघ जाते हैं। पर इसीसे वे सभी शूरवीर नहीं हो जाते। आरे मूर्ख बंदर! सुन--।

चौपाई

मम भुज सागर बल जल पूरा। जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा॥ बीस पयोधि अगाध अपारा। को अस बीर जो पाइहि पारा॥ २ ॥

अर्थ:

मेरी एक-एक भुजारूपी समुद्र बलरूपी जल से पूर्ण है, जिसमें बहुत-से शूरवीर देवता और मनुष्य डूब चुके हैं। [बता,] कौन ऐसा शूरवीर है जो मेरे इन अथाह और अपार बीस समुद्रोंका पार पा जायगा ?।

चौपाई

दिगपालन्ह मैं नीर भरावा। भूप सुजस खल मोहि सुनावा॥ जौं पै समर सुभट तव नाथा। पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा॥ ३ ॥

अर्थ:

ओरे दुष्ट! मैंने दिक्पालोंतकसे जल भरवाया और तू एक राजा का मुझे सुयश सुनाता है! यदि तेरा मालिक, जिसकी गुणगाथा तू बार-बार कह रहा है, संग्राम में लड़नेवाला योद्धा है--।

चौपाई

तौ बसीठ पठवत केहि काजा। रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा॥ हरगिरि मथन निरखु मम बाहू। पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू॥ ४ ॥

अर्थ:

तो [फिर] वह दूत किसलिये भेजता है ? शत्रुसे प्रीति (सन्धि) करते उसे लाज नहीं आती ? [पहले ] कैलास का मथन करनेवाली मेरी भुजाओं को देख। फिर अरे मूर्ख वानर! अपने मालिक की सराहना करना।

दोहा

सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस। हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस॥ २८ ॥

अर्थ:

रावण के समान शूरवीर कौन है ? जिसने अपने ही हाथोंसे सिर काट-काटकर अत्यन्त हर्षके साथ बहुत बार उन्हें अग्निमें होम दिया! स्वयं गौरीपति शिवजी इस बातके साक्षी हैं।

दोहा 29 के अंतर्गत
चौपाई

जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला॥ नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची॥ १ ॥

अर्थ:

मस्तकों के जलते समय जब मैंने विधाताके लिखे हुए अंक अपने ललाट पर देखे, तब मनुष्यके हाथसे अपनी मृत्यु होना बाँचकर, विधाताकी वाणी (लेख को) असत्य जानकर मैं हँसा।

चौपाई

सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें॥ आन बीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागें॥ २ ॥

अर्थ:

उस बात को समझकर (स्मरण करके) भी मेरे मनमें डर नहीं है। [क्योंकि मैं समझता हूँ कि] बूढ़े ब्रह्मा ने बुद्धि-भ्रम से ऐसा लिख दिया है। अरे मूर्ख! तू लज्जा और मर्यादा छोड़कर मेरे आगे बार-बार दूसरे वीरका बल कहता है !।

चौपाई

कह अंगद सलज्ज जग माहीं। रावन तोहि समान कोउ नाहीं॥ लाजवंत तव सहज सुभाऊ। निज मुख निज गुन कहसि न काऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

अंगदने कहा--अरे रावण! तेरे समान लज्जावान् जगत् में कोई नहीं है। लजाशीलता तो तेरा सहज स्वभाव ही है। तू अपने मुँहसे अपने गुण कभी नहीं कहता।

चौपाई

सिर अरु सैल कथा चित रही। ताते बार बीस तैं कही॥ सो भुजबल राखेहु उर घाली। जीतेहु सहसबाहु बलि बाली॥ ४ ॥

अर्थ:

सिर काटने और कैलास उठाने की कथा चित्तमें चढ़ी हुई थी, इससे तूने उसे बीसों बार कहा। भुजाओं के उस बल को तो तूने हृदय में ही टाल रखा है, जिससे तूने सहस्रबाहु, बलि और बालि को जीता था।

चौपाई

सुनु मतिमंद देहि अब पूरा। काटें सीस कि होइअ सूरा॥ इंद्रजालि कहुँ कहिअ न बीरा। काटइ निज कर सकल सरीरा॥ ५ ॥

अर्थ:

ओरे मन्दबुद्धि! सुन, अब बस कर। सिर काटनेसे भी क्या कोई शूरवीर हो जाता है ? इन्द्रजाल रचनेवालेको वीर नहीं कहा जाता, यद्यपि वह अपने ही हाथों अपना सारा शरीर काट डालता है !।

दोहा

जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद। ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद॥ २९ ॥

अर्थ:

ओरे मन्दबुद्धि! समझकर देख। पतंगे मोहवश आग में जल मरते हैं, गदहोंके झुंड बोझ लादकर चलते हैं; पर इस कारण वे शूरवीर नहीं कहलाते।

दोहा 30 के अंतर्गत
चौपाई

अब जनि बतबढ़ाव खल करही। सुनु मम बचन मान परिहरही॥ दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ। अस बिचारि रघुबीर पठायउँ॥ १ ॥

अर्थ:

अरे दुष्ट! अब बतबढ़ाव मत कर; मेरा वचन सुन और अभिमान त्याग दे! हे दशमुख! मैं दूत की तरह [सन्धि करने] नहीं आया हूँ। श्रीरघुवीर ने ऐसा विचारकर मुझे भेजा है--।

चौपाई

बार बार अस कहइ कृपाला। नहिं गजारि जसु बधें सृकाला॥ मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे। सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे॥ २ ॥

अर्थ:

कृपालु श्रीरामजी बार-बार ऐसा कहते हैं कि स्यार के मारने से सिंह को यश नहीं मिलता। अरे मूर्ख! प्रभु के उन वचनों को मन में समझकर (याद करके) ही मैंने तेरे कठोर वचन सहे हैं।

चौपाई

नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लै जातेउँ सीतहि बरजोरा॥ जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी॥ ३ ॥

अर्थ:

नहीं तो तेरे मुँह तोड़कर मैं सीता जी को जबरदस्ती ले जाता। अरे अधम! देवताओं के शत्रु! तेरा बल तो मैंने तभी जान लिया जब तू सूने में परायी स्त्री को हर (चुरा) लाया।

चौपाई

तैं निसिचरपति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता॥ जौं न राम अपमानहि डरऊँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ॥ ४ ॥

अर्थ:

तू राक्षसों का राजा और बड़ा अभिमानी है। परन्तु मैं तो श्रीरघुनाथजी के सेवक (सुग्रीव) का दूत (सेवक का भी सेवक) हूँ। यदि मैं श्रीरामजी के अपमान से न डरूँ तो तेरे देखते-देखते ऐसा तमाशा करूँ कि--।

दोहा

तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ। तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ॥ ३० ॥

अर्थ:

तुझे जमीन पर पटककर, तेरी सेना का संहार कर और तेरे गाँव को चौपट [नष्ट-भ्रष्ट] करके, अरे मूर्ख! तेरी युवती स्त्रियों सहित जानकीजी को ले जाऊँ।

दोहा 31 के अंतर्गत
चौपाई

जौं अस करौं तदपि न बड़ाई। मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई॥ कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा। अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा॥ १ ॥

अर्थ:

यदि ऐसा करूँ, तो भी इसमें कोई बड़ाई नहीं है। मरे हुए को मारने में कुछ भी पुरुषत्व (बहादुरी) नहीं है। वाममार्गी, कामी, कंजूस, अत्यन्त मूढ़, अति दरिद्र, अयशस्वी, अति बूढ़ा,

चौपाई

सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी॥ तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवत सव सम चौदह प्रानी॥ २ ॥

अर्थ:

नित्य का रोगी, निरन्तर क्रोधयुक्त रहनेवाला, भगवान् विष्णु से विमुख, वेद और संतों का विरोधी, अपना ही शरीर पोषण करनेवाला, पराई निंदा करनेवाला और पाप की खान (महान पापी)--ये चौदह प्राणी जीते ही मुरदे के समान हैं।

चौपाई

अस बिचारि खल बधउँ न तोही। अब जनि रिस उपजावसि मोही॥ सुनि सकोप कह निसिचर नाथा। अधर दसन दसि मीजत हाथा॥ ३ ॥

अर्थ:

अरे दुष्ट! ऐसा विचार कर मैं तुझे नहीं मारता। अब तू मुझमें क्रोध न पैदा कर (मुझे गुस्सा न दिला)। यह सुनकर क्रोधित होकर राक्षसराज रावण दाँतों से होंठ काटकर, हाथ मलता हुआ बोला--।

चौपाई

रे कपि अधम मरन अब चहसी। छोटे बदन बात बड़ि कहसी॥ कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें। बल प्रताप बुधि तेज न ताकें॥ ४ ॥

अर्थ:

अरे नीच बंदर! अब तू मरना ही चाहता है! इसी से छोटे मुँह बड़ी बात कहता है। अरे मूर्ख बंदर! तू जिसके बल पर कड़वे वचन बक रहा है, उसमें बल, प्रताप, बुद्धि अथवा तेज कुछ भी नहीं है।

दोहा

अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास। सोदुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास॥ ३१ (क) ॥

अर्थ:

उसे गुणहीन और मानहीन समझकर ही तो पिता ने वनवास दिया। उस पर उसका दुःख, युवती स्त्री के विरह और फिर रात-दिन मेरा त्रास बना रहता है।

दोहा

जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक। खाहिं निसाचरदिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक॥ ३१ (ख) ॥

अर्थ:

जिनके बल का तुझे गर्व है, ऐसे अनेकों मनुष्यों को तो राक्षस रात-दिन खा जाते हैं। अरे मूढ़! हठ छोड़कर समझ (विचार कर)।

दोहा 32 के अंतर्गत
चौपाई

जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा॥ हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना॥ १ ॥

अर्थ:

जब उसने श्रीरामजी की निन्दा की, तब तो कपिश्रेष्ठ अंगद अत्यन्त क्रोधित हुए। क्योंकि [शास्त्र ऐसा कहते हैं कि] जो अपने कानों से भगवान् विष्णु और शिव की निन्दा सुनता है, उसे गोवध के समान पाप होता है।

चौपाई

कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी॥ डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारुत ग्रसे॥ २ ॥

अर्थ:

वानरश्रेष्ठ अंगद बहुत जोर से कटकटाये (शब्द किया) और उन्होंने तमककर (जोर से) अपने दोनों भुजदण्डों को पृथ्वी पर दे मारा। पृथ्वी हिलने लगी, [जिससे बैठे हुए] सभासद् गिर पड़े और भय से ग्रस्त होकर भाग चले।

चौपाई

गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर॥ कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे॥ ३ ॥

अर्थ:

रावण गिरते-गिरते सँभलकर उठा। उसके अत्यन्त सुन्दर मुकुट पृथ्वी पर गिर पड़े। कुछ तो उसने उठाकर अपने सिरों पर सुधारकर रख लिया और कुछ अंगद ने उठाकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के पास फेंक दिये।

चौपाई

आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लूक परन बिधि लागे॥ की रावन करि कोप चलाए। कुलिस चारि आवत अति धाए॥ ४ ॥

अर्थ:

मुकुटों को आते देखकर वानर भागे। [सोचने लगे] विधाता! क्या दिन में ही उल्का पड़ने लगीं (तारे टूटकर गिरने लगे) ? अथवा क्या रावण ने क्रोध करके चार वज्र चलाए हैं, जो बड़े वेग से आ रहे हैं ?

चौपाई

कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू। लूक न असनि केतु नहिं राहू॥ ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे॥ ५ ॥

अर्थ:

प्रभु ने [उनसे] हँसकर कहा-मन में डरो नहीं। ये न उल्का हैं, न वज्र हैं और न केतु या राहु ही हैं। अरे भाई! ये तो रावण के मुकुट हैं; जो बालिपुत्र अंगद के फेंके हुए आ रहे हैं।

दोहा

तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास। कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास॥ ३२ (क) ॥

अर्थ:

पवनपुत्र श्रीहनुमानजी ने उछलकर उन्हें हाथ से पकड़ लिया और लाकर प्रभु के पास रख दिया। रीछ और वानर तमाशा देखने लगे। उनका प्रकाश सूर्य के समान था।

दोहा

उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ। धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ॥ ३२ (ख) ॥

अर्थ:

वहाँ (सभा में) क्रोधयुक्त रावण सबसे क्रोधित होकर कहने लगा कि--बंदर को पकड़ लो और पकड़कर मार डालो। अंगद यह सुनकर मुसकराने लगे।

दोहा 33 के अंतर्गत
चौपाई

एहि बधि बेगि सुभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु॥ मर्कटहीन करहु महि जाई। जिअत धरहु तापस द्वौ भाई॥ १ ॥

अर्थ:

इसे मारकर सब योद्धा तुरंत दौड़ो और जहाँ-कहीं रीछ-वानरों को पाओ, वहीं खा डालो। पृथ्वी को बंदरों से रहित कर दो और जाकर दोनों तपस्वी भाइयों (राम-लक्ष्मण) को जीते-जी पकड़ लो।

चौपाई

पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा॥ मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती॥ २ ॥

अर्थ:

युवराज अंगद क्रोधित होकर बोले--तुझे गाल बजाते लाज नहीं आती! अरे निर्लज्ज! अरे कुलघाती! गला काटकर मर जा! मेरा बल देखकर भी क्या तेरी छाती नहीं फटती!

चौपाई

रे त्रिय चोर कुमारग गामी। खल मल रासि मंदमति कामी॥ सन्यपात जल्पसि दुर्बादा। भएसि कालबस खल मनुजादा॥ ३ ॥

अर्थ:

ओरे स्त्री के चोर! अरे कुमार्ग पर चलनेवाले! अरे दुष्ट, पाप की राशि, मन्दबुद्धि और कामी! तू सन्निपात में क्या दुर्वचन बक रहा है? अरे दुष्ट राक्षस! तू काल के वश हो गया है!

चौपाई

याको फलु पावहिगो आगें। बानर भालु चपेटन्हि लागें॥ रामु मनुज बोलत असि बानी। गिरहिं न तव रसना अभिमानी॥ ४ ॥

अर्थ:

इसका फल तू आगे वानर और भालुओं के चपेटे लगने पर पावेगा। राम मनुष्य हैं, ऐसा वचन बोलते ही, अरे अभिमानी! तेरी जीभें नहीं गिर पड़तीं ?

चौपाई

गिरिहहिं रसना संसय नाहीं। सिरन्हि समेत समर महि माहीं॥ ५ ॥

अर्थ:

इसमें सन्देह नहीं है कि तेरी जीभें [अकेले नहीं वरन्] सिरों के साथ रणभूमि में गिरेंगी।

सोरठा

सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर। बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़॥ ३३ (क) ॥

अर्थ:

रे दशकन्ध! जिसने एक ही बाण से बालि को मार डाला, वह मनुष्य कैसे है? अरे कुजाति, अरे जड़! बीस आँखें होने पर भी तू अन्धा है। तेरे जन्म को धिक्कार है।

सोरठा

तव सोनित कीं प्यास तृषित राम सायक निकर। तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम॥ ३३ (ख) ॥

अर्थ:

श्रीरामचन्द्रजी के बाण-समूह तेरे रक्त की प्यास से तृषित हैं। [वे प्यासे ही रह जायाँगे] इस डर से, अरे कड़वी बकवाद करनेवाले नीच राक्षस! मैं तुझे छोड़ता हूँ।

दोहा 34 के अंतर्गत
चौपाई

मैं तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक॥ असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं॥ १ ॥

अर्थ:

मैं तेरे दाँत तोड़ने में समर्थ हूँ। पर क्या करूँ? श्रीरघुनाथजी ने मुझे आज्ञा नहीं दी। ऐसा क्रोध आता है कि तेरे दसों मुँह तोड़ डालूँ और [तेरी] लंका को पकड़कर समुद्र में डुबा दूँ।

चौपाई

गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका॥ मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा॥ २ ॥

अर्थ:

तेरी लंका गूलर के फल के समान है। तुम सब कीड़े उसके भीतर [अज्ञानवश] निडर होकर बस रहे हो। मैं बंदर हूँ, मुझे इस फल को खाते क्या देर थी? पर उदार (कृपालु) श्रीरामचन्द्रजी ने वैसी आज्ञा नहीं दी।

चौपाई

जुगुति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई॥ बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा॥ ३ ॥

अर्थ:

अंगद की युक्ति सुनकर रावण मुसकराया [और बोला--] ओरे मूर्ख! बहुत झूठ बोलना तूने कहाँ सीखा? बालि ने तो कभी ऐसा गाल नहीं मारा। जान पड़ता है तू तपस्वियों से मिलकर लबारा हो गया है।

चौपाई

साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा॥ समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा॥ ४ ॥

अर्थ:

[अंगद ने कहा--] अरे बीस भुजावाले! यदि तेरी दसों जीभें मैंने नहीं उखाड़ लीं तो सचमुच मैं लबार ही हूँ। श्रीरामचन्द्रजी के प्रताप को समझकर (स्मरण करके) अंगद क्रोधित हो उठे और उन्होंने रावण की सभा में प्रण करके (दृढ़ता के साथ) पैर रोप दिया।

चौपाई

जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी॥ सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा॥ ५ ॥

अर्थ:

[और कहा--] अरे मूर्ख! यदि तू मेरा चरण हटा सके तो श्रीरामजी लौट जाएँगे, मैं सीताजी को हार गया। रावण ने कहा--हे सब वीरों! सुनो, पैर पकड़कर बंदर को पृथ्वी पर पछाड़ दो।

चौपाई

इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना॥ झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई॥ ६ ॥

अर्थ:

इन्द्रजीत (मेघनाद) आदि अनेक बलवान योद्धा जहाँ-तहाँ से हर्षित होकर उठे। वे पूरे बल से बहुत-से उपाय करके झपटते हैं। पर पैर टलता नहीं, तब सिर नीचा करके फिर अपने-अपने स्थान पर जा बैठ जाते हैं।

चौपाई

पुनि उठि झपटहिं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती॥ पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी॥ ७ ॥

अर्थ:

[काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] वे देवताओं के शत्रु (राक्षस) फिर उठकर झपटते हैं। परन्तु हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! अंगद का चरण उनसे वैसे ही नहीं टलता जैसे कुयोगी (विषयी) पुरुष मोह-रूपी वृक्ष को नहीं उखाड़ सकते।

दोहा

कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ। झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ॥ ३४ (क) ॥

अर्थ:

करोड़ों वीर योद्धा जो बल में मेघनाद के समान थे, हर्षित होकर उठे। वे बार-बार झपटते हैं, पर वानर का चरण नहीं उठता, तब सिर नवाकर बैठ जाते हैं।

दोहा

भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत रिपु मद भाग। कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग॥ ३४ (ख) ॥

अर्थ:

जैसे करोड़ों विघ्न आने पर भी संत का मन नीति को नहीं छोड़ता, वैसे ही वानर (अंगद) का चरण पृथ्वी को नहीं छोड़ता। यह देखकर शत्रु (रावण) का मद भाग गया।

दोहा 35 के अंतर्गत
चौपाई

कपि बल देखि सकल हियँ हारे। उठा आपु कपि कें परचारे॥ गहत चरन कह बालिकुमारा। मम पद गहें न तोर उबारा॥ १ ॥

अर्थ:

अंगद का बल देखकर सब हृदय में हार गये। तब अंगद के परचारे पर रावण स्वयं उठा। जब वह अंगद का चरण पकड़ने लगा, तब बालिकुमार अंगद ने कहा--मेरा पद पकड़ लेने से तेरा बचाव नहीं होगा!

चौपाई

गहसि न राम चरन सठ जाई। सुनत फिरा मन अति सकुचाई॥ भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई॥ २ ॥

अर्थ:

ओरे मूर्ख! तू जाकर श्रीरामजी के चरण क्यों नहीं पकड़ता? यह सुनकर वह मन में बहुत ही सकुचाकर लौट गया। उसकी सारी श्री जाती रही। वह ऐसा तेजहीन हो गया जैसे मध्य दिवस में चन्द्रमा दिखायी देता है।

चौपाई

सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई॥ जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा॥ ३ ॥

अर्थ:

वह सिर नीचा करके सिंहासन पर जा बैठा। मानो सारी सम्पत्ति गँवाकर बैठा हो। श्रीरामचन्द्रजी जगत् भर के आत्मा और प्राणों के स्वामी हैं। उनसे विमुख रहने वाला शान्ति कैसे पा सकता है?

चौपाई

उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा॥ तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई॥ ४ ॥

अर्थ:

[शिवजी कहते हैं--] हे उमा! जिन श्रीरामचन्द्रजी के भृकुटि-विलास (भौंह के इशारे) से विश्व उत्पन्न होता है और फिर नाश को प्राप्त होता है; जो तृण को वज्र और वज्र को तृण बना देते हैं (अत्यन्त निर्बल को महान् प्रबल और महान् प्रबल को अत्यन्त निर्बल कर देते हैं), उनके दूत का प्रण, कहो, कैसे टल सकता है?

चौपाई

पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना॥ रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो॥ ५ ॥

अर्थ:

फिर अंगद ने अनेक प्रकार से नीति कही। पर रावण ने नहीं माना; क्योंकि उसका काल निकट आ गया था। शत्रु के गर्व को चूर करके अंगद ने उसे प्रभु श्रीरामचन्द्रजी का सुयश सुनाया और फिर वह बालि नृप का पुत्र यह कहकर चल दिया--।

चौपाई

हतौं न खेत खेलाइ खेलाई। तोहि अबहिं का करौं बड़ाई॥ प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा। सो सुनि रावन भयउ दुखारा॥ ६ ॥

अर्थ:

रणभूमि में तुझे खेला-खेलाकर न मारूँ तबतक अभी क्या बड़ाई करूँ। अंगद ने पहले ही (सभामें आने से पूर्व ही) उसके पुत्र को मार डाला था। वह सुनकर रावण दुखी हो गया।

चौपाई

जातुधान अंगद पन देखी। भय ब्याकुल सब भए बिसेषी॥ ७ ॥

अर्थ:

अंगद का प्रण [सफल] देखकर सब राक्षस भय से अत्यन्त ही व्याकुल हो गये।

दोहा

रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज। पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज॥ ३५ (क) ॥

अर्थ:

शत्रु के बल का मर्दन कर, बल की राशि बालिपुत्र अंगदजी ने हर्षित होकर श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमल पकड़ लिये। उनका शरीर पुलकित है और नेत्रों में [आनन्दाश्रुओं का] जल भरा है।

दोहा

साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ। मंदोदरीं रावनहि बहुरि कहा समुझाइ॥ ३५ (ख) ॥

अर्थ:

संध्या हो गयी जानकर दशग्रीव विलखता हुआ (उदास होकर) महल में गया। मन्दोदरी ने रावण को समझाकर फिर कहा--।