अंगदजी का लंका जाना और रावण की सभा में अंगद-रावण-संवाद
अंगदजी दूत बनकर लंका की सभा में पहुँचते हैं और निर्भय वचन कहते हैं। वे रावण को अंतिम बार सीताजी को लौटाने और श्रीरामजी की शरण ग्रहण करने का अवसर देते हैं।
लंकाकाण्ड · प्रकरण ८ / ३७
प्रकरण पाठ
एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं॥ भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहिं जारी॥ ४ ॥
अर्थ:
एक-दूसरे को मर्म (असली बात) नहीं बतलाते, उस (रावण के पुत्र) का वध समझकर सब चुप मार कर रह जाते हैं। [रावण-पुत्र की मृत्यु जानकर और राक्षसों को भय के मारे भागते देखकर] नगर भर में कोलाहल मच गया कि जिसने लंका जलायी थी, वही वानर फिर आ गया है।
उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती। सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती॥ बर पायहु कीन्हेहु सब काजा। जीतेहु लोकपाल सब राजा॥ २ ॥
अर्थ:
तुम्हारा उत्तम कुल है, पुलस्त्य ऋषि के तुम पौत्र हो। शिवजी की और ब्रह्माजी की तुमने बहुत प्रकार से पूजा की है। उनसे वर पाये हो और सब काम सिद्ध किये हैं। लोकपालों और सब राजाओं को तुमने जीत लिया है।
अंगद नाम बालि कर बेटा। तासों कबहुँ भई ही भेटा॥ अंगद बचन सुनत सकुचाना। रहा बालि बानर मैं जाना॥ २ ॥
अर्थ:
[अंगद ने कहा--] मेरा नाम अंगद है, मैं बालि का पुत्र हूँ। उनसे कभी तुम्हारी भेंट हुई थी? अंगद का वचन सुनते ही रावण कुछ सकुचा गया [और बोला--] हाँ, मैं जान गया (मुझे याद आ गया), बालि नाम का एक बंदर था।
अंगद तहीं बालि कर बालक। उपजेहु बंस अनल कुल घालक॥ गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु। निज मुख तापस दूत कहायहु॥ ३ ॥
अर्थ:
अरे अंगद! तू ही बालि का लड़का है? अरे कुलनाशक! तू तो अपने कुलरूपी बाँस के लिये अग्निरूप ही पैदा हुआ! गर्भ में ही क्यों न नष्ट हो गया? तू व्यर्थ ही पैदा हुआ जो अपने ही मुँह से तपस्वियों का दूत कहलाया!
कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी॥ देखी नयन दूत रखवारी। बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी॥ ३ ॥
अर्थ:
अंगद ने कहा--तुम्हारी धर्मशीलता मैंने भी सुनी है। [वह यह कि] तुमने परायी स्त्री की चोरी की है! और दूत की रखवारी की बात तो अपनी आँखों से देख ली। ऐसे धर्म के ब्रत को धारण करनेवाले तुम डूबकर मर नहीं जाते!
अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती॥ मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउँ नहिं काना॥ २ ॥
अर्थ:
है अंगद! तेरी जाति स्वामिभक्त है। [फिर भला] तू अपने मालिक के गुण इस प्रकार कैसे न बखानेगा ? मैं गुणग्राहक (गुणों का आदर करनेवाला) और परम सुजान (समझदार) हूँ, इसीसे तेरी जली-कटी बक-बक पर कान (ध्यान) नहीं देता।
कह कपि तव गुन गाहकताई। सत्य पवनसुत मोहि सुनाई॥ बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा। तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा॥ ३ ॥
अर्थ:
अंगद ने कहा-तुम्हारी सच्ची गुणग्राहकता तो मुझे हनुमानजी ने सुनायी थी। उसने अशोकवन को विध्वंस करके, तुम्हारे पुत्र को मारकर नगर को जला दिया था। तो भी [तुमने अपनी गुणग्राहकता के कारण यही समझा कि] उसने तुम्हारा कुछ भी अपकार नहीं किया।
सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई॥ देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा॥ ४ ॥
अर्थ:
तुम्हारा वही सुन्दर स्वभाव विचारकर, हे दशकंधर ! मैंने कुछ धृष्टता की है। हनुमान ने जो कुछ कहा था, उसे आकर मैंने प्रत्यक्ष देख लिया कि तुम्हें न लज्जा है, न क्रोध है और न चिढ़ है।
जौं असि मति पितु खाए कीसा। कहि अस बचन हँसा दससीसा॥ पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही। अबहीं समुझि परा कछु मोही॥ ५ ॥
अर्थ:
[रावण बोला--] अरे वानर! जब तेरी ऐसी बुद्धि है तभी तो तू बाप को खा गया। ऐसा वचन कहकर रावण हँसा। अंगद ने कहा--पिता को खाकर फिर तुमको भी खा डालता। परन्तु अभी तुरंत कुछ और ही बात मेरी समझ में आ गयी !
सुनु सठ सोइ रावन बलसीला। हरगिरि जान जासु भुज लीला॥ जान उमापति जासु सुराई। पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई॥ १ ॥
अर्थ:
[रावण ने कहा--] ओरे मूर्ख! सुन, मैं वही बलवान् रावण हूँ जिसकी भुजाओं की लीला (करामात) कैलास पर्वत जानता है। जिसकी शूरता उमापति महादेवजी जानते हैं, जिन्हें अपने सिररूपी पुष्प चढ़ा-चढ़ाकर मैंने पूजा था।
सिर सरोज निज करन्हि उतारी। पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी॥ भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला। सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला॥ २ ॥
अर्थ:
सिररूपी कमलों को अपने हाथों से उतार-उतारकर मैंने अगणित बार त्रिपुरारि शिवजी की पूजा की है। अरे मूर्ख ! मेरी भुजाओं का पराक्रम दिक्पाल जानते हैं, जिनके हृदय में वह आज भी चुभ रहा है।
जानहिं दिग्गज उर कठिनाई। जब जब भिरउँ जाइ बरिआई॥ जिन्ह के दसन कराल न फूटे। उर लागत मूलक इव टूटे॥ ३ ॥
अर्थ:
दिग्गज (दिशाओं के हाथी) मेरी छाती की कठोरता को जानते हैं। जिनके भयानक दाँत, जब-जब जाकर मैं उनसे जबरदस्ती भिड़ा, मेरी छाती में कभी नहीं फूटे (अपना चिह्न भी नहीं बना सके), बल्कि मेरी छाती से लगते ही वे मूली की तरह टूट गये।
जासु चलत डोलति इमि धरनी। चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी॥ सोइ रावन जग बिदित प्रतापी। सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी॥ ४ ॥
अर्थ:
जिसके चलते समय पृथ्वी इस प्रकार हिलती है जैसे मतवाले हाथी के चढ़ते समय छोटी नाव! मैं वही जगत्प्रसिद्ध प्रतापी रावण हूँ। अरे झूठी बकवाद करने वाले ! क्या तूने मुझको कानों से कभी नहीं सुना ?
राम मनुज कस रे सठ बंगा। धन्वी कामु नदी पुनि गंगा॥ पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा। अन्न दान अरु रस पीयूषा॥ ३ ॥
अर्थ:
क्यों रे मूर्ख उद्दण्ड! श्रीरामचन्द्रजी मनुष्य हैं? कामदेव भी क्या धनुर्धारी है? और नदी फिर गंगा है? कामधेनु क्या पशु है? और कल्पवृक्ष क्या पेड़ है? अन्न भी क्या दान है? और अमृत क्या रस है ?।
बैनतेय खग अहि सहसानन। चिंतामनि पुनि उपल दसानन॥ सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा। लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा॥ ४ ॥
अर्थ:
गरुड़जी क्या पक्षी हैं? शेषजी क्या सर्प हैं? अरे रावण! चिन्तामणि भी क्या पत्थर है ? अरे ओ मूर्ख ! सुन, वैकुण्ठ भी क्या लोक है? और श्रीरघुनाथजी की अखण्ड भक्ति क्या [और लाभों जैसा ही] लाभ है ?।
सठ साखामृग जोरि सहाई। बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई॥ नाघहिं खग अनेक बारीसा। सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा॥ १ ॥
अर्थ:
रे दुष्ट! वानरों की सहायता जोड़कर राम ने समुद्र बाँध लिया; बस, यही उसकी प्रभुता है। समुद्र को तो अनेकों पक्षी भी लाँघ जाते हैं। पर इसीसे वे सभी शूरवीर नहीं हो जाते। आरे मूर्ख बंदर! सुन--।
तौ बसीठ पठवत केहि काजा। रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा॥ हरगिरि मथन निरखु मम बाहू। पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू॥ ४ ॥
अर्थ:
तो [फिर] वह दूत किसलिये भेजता है ? शत्रुसे प्रीति (सन्धि) करते उसे लाज नहीं आती ? [पहले ] कैलास का मथन करनेवाली मेरी भुजाओं को देख। फिर अरे मूर्ख वानर! अपने मालिक की सराहना करना।
सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें। लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें॥ आन बीर बल सठ मम आगें। पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागें॥ २ ॥
अर्थ:
उस बात को समझकर (स्मरण करके) भी मेरे मनमें डर नहीं है। [क्योंकि मैं समझता हूँ कि] बूढ़े ब्रह्मा ने बुद्धि-भ्रम से ऐसा लिख दिया है। अरे मूर्ख! तू लज्जा और मर्यादा छोड़कर मेरे आगे बार-बार दूसरे वीरका बल कहता है !।
तैं निसिचरपति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता॥ जौं न राम अपमानहि डरऊँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ॥ ४ ॥
अर्थ:
तू राक्षसों का राजा और बड़ा अभिमानी है। परन्तु मैं तो श्रीरघुनाथजी के सेवक (सुग्रीव) का दूत (सेवक का भी सेवक) हूँ। यदि मैं श्रीरामजी के अपमान से न डरूँ तो तेरे देखते-देखते ऐसा तमाशा करूँ कि--।
सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी॥ तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवत सव सम चौदह प्रानी॥ २ ॥
अर्थ:
नित्य का रोगी, निरन्तर क्रोधयुक्त रहनेवाला, भगवान् विष्णु से विमुख, वेद और संतों का विरोधी, अपना ही शरीर पोषण करनेवाला, पराई निंदा करनेवाला और पाप की खान (महान पापी)--ये चौदह प्राणी जीते ही मुरदे के समान हैं।
जब तेहिं कीन्हि राम कै निंदा। क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा॥ हरि हर निंदा सुनइ जो काना। होइ पाप गोघात समाना॥ १ ॥
अर्थ:
जब उसने श्रीरामजी की निन्दा की, तब तो कपिश्रेष्ठ अंगद अत्यन्त क्रोधित हुए। क्योंकि [शास्त्र ऐसा कहते हैं कि] जो अपने कानों से भगवान् विष्णु और शिव की निन्दा सुनता है, उसे गोवध के समान पाप होता है।
कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी॥ डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारुत ग्रसे॥ २ ॥
अर्थ:
वानरश्रेष्ठ अंगद बहुत जोर से कटकटाये (शब्द किया) और उन्होंने तमककर (जोर से) अपने दोनों भुजदण्डों को पृथ्वी पर दे मारा। पृथ्वी हिलने लगी, [जिससे बैठे हुए] सभासद् गिर पड़े और भय से ग्रस्त होकर भाग चले।
गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर॥ कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे॥ ३ ॥
अर्थ:
रावण गिरते-गिरते सँभलकर उठा। उसके अत्यन्त सुन्दर मुकुट पृथ्वी पर गिर पड़े। कुछ तो उसने उठाकर अपने सिरों पर सुधारकर रख लिया और कुछ अंगद ने उठाकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के पास फेंक दिये।
गूलरि फल समान तव लंका। बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका॥ मैं बानर फल खात न बारा। आयसु दीन्ह न राम उदारा॥ २ ॥
अर्थ:
तेरी लंका गूलर के फल के समान है। तुम सब कीड़े उसके भीतर [अज्ञानवश] निडर होकर बस रहे हो। मैं बंदर हूँ, मुझे इस फल को खाते क्या देर थी? पर उदार (कृपालु) श्रीरामचन्द्रजी ने वैसी आज्ञा नहीं दी।
साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा॥ समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा॥ ४ ॥
अर्थ:
[अंगद ने कहा--] अरे बीस भुजावाले! यदि तेरी दसों जीभें मैंने नहीं उखाड़ लीं तो सचमुच मैं लबार ही हूँ। श्रीरामचन्द्रजी के प्रताप को समझकर (स्मरण करके) अंगद क्रोधित हो उठे और उन्होंने रावण की सभा में प्रण करके (दृढ़ता के साथ) पैर रोप दिया।
इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना॥ झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई॥ ६ ॥
अर्थ:
इन्द्रजीत (मेघनाद) आदि अनेक बलवान योद्धा जहाँ-तहाँ से हर्षित होकर उठे। वे पूरे बल से बहुत-से उपाय करके झपटते हैं। पर पैर टलता नहीं, तब सिर नीचा करके फिर अपने-अपने स्थान पर जा बैठ जाते हैं।
पुनि उठि झपटहिं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती॥ पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी॥ ७ ॥
अर्थ:
[काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] वे देवताओं के शत्रु (राक्षस) फिर उठकर झपटते हैं। परन्तु हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! अंगद का चरण उनसे वैसे ही नहीं टलता जैसे कुयोगी (विषयी) पुरुष मोह-रूपी वृक्ष को नहीं उखाड़ सकते।
उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा॥ तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई॥ ४ ॥
अर्थ:
[शिवजी कहते हैं--] हे उमा! जिन श्रीरामचन्द्रजी के भृकुटि-विलास (भौंह के इशारे) से विश्व उत्पन्न होता है और फिर नाश को प्राप्त होता है; जो तृण को वज्र और वज्र को तृण बना देते हैं (अत्यन्त निर्बल को महान् प्रबल और महान् प्रबल को अत्यन्त निर्बल कर देते हैं), उनके दूत का प्रण, कहो, कैसे टल सकता है?
पुनि कपि कही नीति बिधि नाना। मान न ताहि कालु निअराना॥ रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो। यह कहि चल्यो बालि नृप जायो॥ ५ ॥
अर्थ:
फिर अंगद ने अनेक प्रकार से नीति कही। पर रावण ने नहीं माना; क्योंकि उसका काल निकट आ गया था। शत्रु के गर्व को चूर करके अंगद ने उसे प्रभु श्रीरामचन्द्रजी का सुयश सुनाया और फिर वह बालि नृप का पुत्र यह कहकर चल दिया--।