सदा रोगबस संतत क्रोधी
सदा रोगबस संतत क्रोधी
चौपाई २, दोहा ३१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सदा रोगबस संतत क्रोधी। बिष्नु बिमुख श्रुति संत बिरोधी॥ तनु पोषक निंदक अघ खानी। जीवत सव सम चौदह प्रानी॥ २ ॥
अर्थ
नित्य का रोगी, निरन्तर क्रोधयुक्त रहनेवाला, भगवान् विष्णु से विमुख, वेद और संतों का विरोधी, अपना ही शरीर पोषण करनेवाला, पराई निंदा करनेवाला और पाप की खान (महान पापी)--ये चौदह प्राणी जीते ही मुरदे के समान हैं।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
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अंगद का लंका में रावण से संवाद