मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला

चौपाई २, दोहा २७ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला। राम बयर अस होइहि हाला॥ तव सिर निकर कपिन्ह के आगें। परिहहिं धरनि राम सर लागें॥ २ ॥

अर्थ

हे मूढ़! व्यर्थ गाल न मार (डींग न हाँक)। श्रीरामजी से वैर करने पर तेरा ऐसा हाल होगा कि तेरे सिर-समूह श्रीरामजी के बाण लगते ही वानरों के आगे पृथ्वी पर पड़ेंगे।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद