बैनतेय खग अहि सहसानन

चौपाई ४, दोहा २६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

बैनतेय खग अहि सहसानन। चिंतामनि पुनि उपल दसानन॥ सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा। लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा॥ ४ ॥

अर्थ

गरुड़जी क्या पक्षी हैं? शेषजी क्या सर्प हैं? अरे रावण! चिन्तामणि भी क्या पत्थर है ? अरे ओ मूर्ख ! सुन, वैकुण्ठ भी क्या लोक है? और श्रीरघुनाथजी की अखण्ड भक्ति क्या [और लाभों जैसा ही] लाभ है ?।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
अंगद का लंका में रावण से संवाद