एहि बधि बेगि सुभट सब धावहु
एहि बधि बेगि सुभट सब धावहु
चौपाई १, दोहा ३३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
एहि बधि बेगि सुभट सब धावहु। खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु॥ मर्कटहीन करहु महि जाई। जिअत धरहु तापस द्वौ भाई॥ १ ॥
अर्थ
इसे मारकर सब योद्धा तुरंत दौड़ो और जहाँ-कहीं रीछ-वानरों को पाओ, वहीं खा डालो। पृथ्वी को बंदरों से रहित कर दो और जाकर दोनों तपस्वी भाइयों (राम-लक्ष्मण) को जीते-जी पकड़ लो।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
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अंगद का लंका में रावण से संवाद