राम बिरोध कुसल जसि होई
राम बिरोध कुसल जसि होई
चौपाई ५, दोहा २१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
राम बिरोध कुसल जसि होई। सो सब तोहि सुनाइहि सोई॥ सुनु सठ भेद होइ मन ताकें। श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाकें॥ ५ ॥
अर्थ
श्रीरामजी से विरोध करने पर जैसी कुशल होती है, वह सब तुमको वे सुनावेंगे। हे मूर्ख! सुन, भेद उसी के मन में पड़ सकता है, जिसके हृदय में श्रीरघुबीर न हों।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा २१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
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अंगद का लंका में रावण से संवाद