रावण को पुनः मंदोदरी का समझाना
मंदोदरी पुनः रावण को नीति, धर्म और परिणाम का स्मरण कराती है। किन्तु रावण मोह और अहंकारवश उसकी बात नहीं मानता।
लंकाकाण्ड · प्रकरण ९ / ३७
प्रकरण पाठ
कंत समुझि मन तजहु कुमतिही। सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही॥ रामानुज लघु रेख खचाई। सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई॥ १ ॥
अर्थ:
हे कंत! मन में समझकर कुबुद्धि को छोड़ दो। आपसे और श्रीरघुनाथजी से युद्ध शोभा नहीं देता। उनके छोटे भाई ने एक जरा-सी रेखा खींच दी थी, उसे भी आप नहीं लाँघ सके, ऐसा तो आपका पुरुषत्व है।
भंजि धनुष जानकी बिआही। तब संग्राम जितेहु किन ताही॥ सुरपति सुत जानइ बल थोरा। राखा जिअत आँखि गहि फोरा॥ ६ ॥
अर्थ:
वहाँ शिवजी का धनुष तोड़कर श्रीरामजी ने जानकी को ब्याहा, तब आपने उनको संग्राम में क्यों नहीं जीता? इन्द्रपुत्र जयंत उनके बल को कुछ-कुछ जानता है। श्रीरामजी ने पकड़कर, केवल उसकी एक आँख ही फोड़ दी और उसे जीवित ही छोड़ दिया।
तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू। मुधा मान ममता मद बहहू॥ अहह कंत कृत राम बिरोधा। काल बिबस मन उपज न बोधा॥ ३ ॥
अर्थ:
हे पति! उन्हें आप बार-बार मनुष्य कहते हैं। आप व्यर्थ ही मान, ममता और मद का बोझा ढो रहे हैं! हा प्रियतम! आपने श्रीरामजी से विरोध कर लिया और काल के विशेष वश होने से आपके मन में अब भी बोध नहीं उत्पन्न होता।
तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए। कहहु तात कवनी बिधि पाए॥ सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी। मुकुट न होहिं भूप गुन चारी॥ ४ ॥
अर्थ:
उसके चार मुकुट तुमने फेंके। हे तात! बताओ, तुमने उनको किस प्रकार से पाया! [अंगद ने कहा] हे सर्वज्ञ! हे शरणागत को सुख देनेवाले! सुनिये। वे मुकुट नहीं हैं। वे तो राजाके चार गुण हैं।