इंद्रजीत आदिक बलवाना
इंद्रजीत आदिक बलवाना
चौपाई ६, दोहा ३४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
इंद्रजीत आदिक बलवाना। हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना॥ झपटहिं करि बल बिपुल उपाई। पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई॥ ६ ॥
अर्थ
इन्द्रजीत (मेघनाद) आदि अनेक बलवान योद्धा जहाँ-तहाँ से हर्षित होकर उठे। वे पूरे बल से बहुत-से उपाय करके झपटते हैं। पर पैर टलता नहीं, तब सिर नीचा करके फिर अपने-अपने स्थान पर जा बैठ जाते हैं।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा ३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
अंगद का लंका में रावण से संवाद