एक एक सन मरमु न कहहीं
एक एक सन मरमु न कहहीं
चौपाई ४, दोहा १८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
एक एक सन मरमु न कहहीं। समुझि तासु बध चुप करि रहहीं॥ भयउ कोलाहल नगर मझारी। आवा कपि लंका जेहिं जारी॥ ४ ॥
अर्थ
एक-दूसरे को मर्म (असली बात) नहीं बतलाते, उस (रावण के पुत्र) का वध समझकर सब चुप मार कर रह जाते हैं। [रावण-पुत्र की मृत्यु जानकर और राक्षसों को भय के मारे भागते देखकर] नगर भर में कोलाहल मच गया कि जिसने लंका जलायी थी, वही वानर फिर आ गया है।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
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अंगद का लंका में रावण से संवाद