अस बिचारि खल बधउँ न तोही
अस बिचारि खल बधउँ न तोही
चौपाई ३, दोहा ३१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
अस बिचारि खल बधउँ न तोही। अब जनि रिस उपजावसि मोही॥ सुनि सकोप कह निसिचर नाथा। अधर दसन दसि मीजत हाथा॥ ३ ॥
अर्थ
अरे दुष्ट! ऐसा विचार कर मैं तुझे नहीं मारता। अब तू मुझमें क्रोध न पैदा कर (मुझे गुस्सा न दिला)। यह सुनकर क्रोधित होकर राक्षसराज रावण दाँतों से होंठ काटकर, हाथ मलता हुआ बोला--।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
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अंगद का लंका में रावण से संवाद