सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई

चौपाई १, दोहा २२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई। चाहत जासु चरन सेवकाई॥ तासु दूत होइ हम कुल बोरा। अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा॥ १ ॥

अर्थ

शिव, ब्रह्मा [ आदि ] देवता और मुनियों के समुदाय जिनके चरणों की सेवा [ करना] चाहते हैं, उनका दूत होकर मैंने कुल को डुबो दिया? अरे ऐसी बुद्धि होने पर भी तुम्हारा हृदय फट नहीं जाता?

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद