मैं तव दसन तोरिबे लायक
मैं तव दसन तोरिबे लायक
चौपाई १, दोहा ३४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
मैं तव दसन तोरिबे लायक। आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक॥ असि रिस होति दसउ मुख तोरौं। लंका गहि समुद्र महँ बोरौं॥ १ ॥
अर्थ
मैं तेरे दाँत तोड़ने में समर्थ हूँ। पर क्या करूँ? श्रीरघुनाथजी ने मुझे आज्ञा नहीं दी। ऐसा क्रोध आता है कि तेरे दसों मुँह तोड़ डालूँ और [तेरी] लंका को पकड़कर समुद्र में डुबा दूँ।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
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अंगद का लंका में रावण से संवाद