आवत मुकुट देखि कपि भागे
आवत मुकुट देखि कपि भागे
चौपाई ४, दोहा ३२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
आवत मुकुट देखि कपि भागे। दिनहीं लूक परन बिधि लागे॥ की रावन करि कोप चलाए। कुलिस चारि आवत अति धाए॥ ४ ॥
अर्थ
मुकुटों को आते देखकर वानर भागे। [सोचने लगे] विधाता! क्या दिन में ही उल्का पड़ने लगीं (तारे टूटकर गिरने लगे) ? अथवा क्या रावण ने क्रोध करके चार वज्र चलाए हैं, जो बड़े वेग से आ रहे हैं ?
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
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अंगद का लंका में रावण से संवाद