अब कहु कुसल बालि कहँ अहई
अब कहु कुसल बालि कहँ अहई
चौपाई ४, दोहा २१ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
अब कहु कुसल बालि कहँ अहई। बिहँसि बचन तब अंगद कहई॥ दिन दस गएँ बालि पहिं जाई। बूझेहु कुसल सखा उर लाई॥ ४ ॥
अर्थ
अब बालि की कुशल तो बता, वह [आजकल] कहाँ है? तब अंगद ने हँसकर कहा-दस (कुछ) दिन बीतने पर [स्वयं ही] बालि के पास जाकर, अपने मित्र को हृदय से लगाकर, उसी से कुशल पूछ लेना।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
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अंगद का लंका में रावण से संवाद