साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा

चौपाई ४, दोहा ३४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा। जौं न उपारिउँ तव दस जीहा॥ समुझि राम प्रताप कपि कोपा। सभा माझ पन करि पद रोपा॥ ४ ॥

अर्थ

[अंगद ने कहा--] अरे बीस भुजावाले! यदि तेरी दसों जीभें मैंने नहीं उखाड़ लीं तो सचमुच मैं लबार ही हूँ। श्रीरामचन्द्रजी के प्रताप को समझकर (स्मरण करके) अंगद क्रोधित हो उठे और उन्होंने रावण की सभा में प्रण करके (दृढ़ता के साथ) पैर रोप दिया।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद