गिरत सँभारि उठा दसकंधर

चौपाई ३, दोहा ३२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

गिरत सँभारि उठा दसकंधर। भूतल परे मुकुट अति सुंदर॥ कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे। कछु अंगद प्रभु पास पबारे॥ ३ ॥

अर्थ

रावण गिरते-गिरते सँभलकर उठा। उसके अत्यन्त सुन्दर मुकुट पृथ्वी पर गिर पड़े। कुछ तो उसने उठाकर अपने सिरों पर सुधारकर रख लिया और कुछ अंगद ने उठाकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के पास फेंक दिये।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद