सुनु रावन परिहरि चतुराई

चौपाई १, दोहा २७ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

सुनु रावन परिहरि चतुराई। भजसि न कृपासिंधु रघुराई॥ जौं खल भएसि राम कर द्रोही। ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही॥ १ ॥

अर्थ

अरे रावण! चतुराई (कपट) छोड़कर सुन। कृपा के समुद्र श्रीरघुनाथजी का तू भजन क्यों नहीं करता ? ओरे दुष्ट ! यदि तू श्रीरामजी का बैरी हुआ तो तुझे ब्रह्मा और रुद्र भी नहीं बचा सकेंगे।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
अंगद का लंका में रावण से संवाद