गिरिहहिं रसना संसय नाहीं

चौपाई ५, दोहा ३३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

गिरिहहिं रसना संसय नाहीं। सिरन्हि समेत समर महि माहीं॥ ५ ॥

अर्थ

इसमें सन्देह नहीं है कि तेरी जीभें [अकेले नहीं वरन्] सिरों के साथ रणभूमि में गिरेंगी।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ३३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद