अंगद स्वामिभक्त तव जाती

चौपाई २, दोहा २४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

अंगद स्वामिभक्त तव जाती। प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती॥ मैं गुन गाहक परम सुजाना। तव कटु रटनि करउँ नहिं काना॥ २ ॥

अर्थ

है अंगद! तेरी जाति स्वामिभक्त है। [फिर भला] तू अपने मालिक के गुण इस प्रकार कैसे न बखानेगा ? मैं गुणग्राहक (गुणों का आदर करनेवाला) और परम सुजान (समझदार) हूँ, इसीसे तेरी जली-कटी बक-बक पर कान (ध्यान) नहीं देता।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद