तौ बसीठ पठवत केहि काजा

चौपाई ४, दोहा २८ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

तौ बसीठ पठवत केहि काजा। रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा॥ हरगिरि मथन निरखु मम बाहू। पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू॥ ४ ॥

अर्थ

तो [फिर] वह दूत किसलिये भेजता है ? शत्रुसे प्रीति (सन्धि) करते उसे लाज नहीं आती ? [पहले ] कैलास का मथन करनेवाली मेरी भुजाओं को देख। फिर अरे मूर्ख वानर! अपने मालिक की सराहना करना।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद