कह दसकंठ कवन तैं बंदर

चौपाई १, दोहा २० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

कह दसकंठ कवन तैं बंदर। मैं रघुबीर दूत दसकंधर॥ मम जनकहि तोहि रही मिताई। तव हित कारन आयउँ भाई॥ १ ॥

अर्थ

रावण ने कहा--अरे बंदर! तू कौन है? [अंगद ने कहा--] हे दशग्रीव! मैं श्रीरघुबीर का दूत हूँ। मेरे पिता से और तुम से मित्रता थी। इसलिये हे भाई! मैं तुम्हारी भलाई के लिये ही आया हूँ।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद