मंदोदरी का फिर रावण को समझाना और श्रीराम की महिमा कहना

मंदोदरी फिर रावण को समझाती है और श्रीराम की दिव्य महिमा बताती है। वह उसे विनाश से बचने के लिए नम्रता और विवेक अपनाने को कहती है।

लंकाकाण्ड · प्रकरण ७ / ३७

प्रकरण पाठ

चौपाई

सयन करहु निज निज गृह जाई। गवने भवन सकल सिर नाई॥ मंदोदरी सोच उर बसेऊ। जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ॥ ३ ॥

अर्थ:

अपने-अपने घर जाकर सो रहो [डरने की कोई बात नहीं है] तब सब लोग सिर नवाकर घर गये। जब से कर्णफूल पृथ्वी पर गिरा, तब से मन्दोदरी के हृदय में सोच बस गया।

चौपाई

सजल नयन कह जुग कर जोरी। सुनहु प्रानपति बिनती मोरी॥ कंत राम बिरोध परिहरहू। जानि मनुज जनि हठ मन धरहू॥ ४ ॥

अर्थ:

नेत्रों में जल भरकर, दोनों हाथ जोड़कर वह [रावण से] कहने लगी- हे प्राणनाथ ! मेरी विनती सुनिये। हे प्रियतम ! श्रीराम से विरोध छोड़ दीजिये। उन्हें मनुष्य जानकर मन में हठ न पकड़े रहिये।

दोहा

बिस्वरूप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु। लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु॥ १४ ॥

अर्थ:

मेरे इन वचनों पर विश्वास कीजिये कि वे रघुकुल के शिरोमणि श्रीरामचन्द्रजी विश्वरूप हैं-- (यह सारा विश्व उन्हीं का रूप है) वेद जिनके अंग-अंग की कल्पना करते हैं।

दोहा 15 के अंतर्गत
चौपाई

पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा॥ भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला॥ १ ॥

अर्थ:

पाताल [जिन विश्वरूप भगवान्‌ का] चरण है, ब्रह्मलोक सिर है, अन्य (बीच के सब) लोकों का विश्राम (स्थिति) जिनके अन्य भिन्न-भिन्न अङ्गों पर है। भयङ्कर काल जिनका भृकुटि-संचालन (भौंहों का चलना) है। सूर्य नेत्र हैं, बादलों का समूह बाल है।

चौपाई

जासु घ्रान अस्विनीकुमारा। निसि अरु दिवस निमेष अपारा॥ श्रवन दिसा दस बेद बखानी। मारुत स्वास निगम निज बानी॥ २ ॥

अर्थ:

अश्विनीकुमार जिनकी नासिका हैं, रात और दिन जिनके अपार निमेष (पलक मारना और खोलना) हैं। दसों दिशाएँ कान हैं, वेद ऐसा कहते हैं। वायु श्वास है और वेद जिनकी अपनी वाणी है।

चौपाई

अधर लोभ जम दसन कराला। माया हास बाहु दिगपाला॥ आनन अनल अंबुपति जीहा। उतपति पालन प्रलय समीहा॥ ३ ॥

अर्थ:

लोभ जिनका अधर (होठ) है, यमराज भयानक दाँत है। माया हँसी है, दिक्पाल भुजाएँ हैं। अग्नि मुख है, वरुण जीभ है। उत्पत्ति, पालन और प्रलय जिनकी चेष्टा (क्रिया) है।

चौपाई

रोम राजि अष्टादस भारा। अस्थि सैल सरिता नस जारा॥ उदर उदधि अधगो जातना। जगमय प्रभु का बहु कलपना॥ ४ ॥

अर्थ:

अठारह प्रकार की असंख्य वनस्पतियाँ जिनकी रोमावली हैं, पर्वत अस्थियाँ हैं, नदियाँ नसों का जाल हैं, समुद्र पेट है और नरक जिनकी नीचे की इन्द्रियाँ हैं। इस प्रकार प्रभु विश्वमय हैं, अधिक कल्पना क्या की जाय ?

दोहा

अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान। मनुज बास सचराचर रूप राम भगवान॥ १५ (क) ॥

अर्थ:

शिव जिनका अहंकार हैं, ब्रह्मा बुद्धि हैं, चन्द्रमा मन हैं और महान् (महत्तत्त्व) ही चित्त हैं। उन्हीं चराचररूप भगवान् श्रीरामजी ने मनुष्यरूप में निवास किया है।

दोहा

अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ। प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ॥ १५ (ख) ॥

अर्थ:

हे प्राणपति ! सुनिये, ऐसा विचारकर प्रभु से वैर छोड़कर श्रीरघुवीर के चरणों में प्रेम कीजिये, जिससे मेरा सुहाग न जाय।

दोहा 16 के अंतर्गत
चौपाई

बिहँसा नारि बचन सुनि काना। अहो मोह महिमा बलवाना॥ नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं। अवगुन आठ सदा उर रहहीं॥ १ ॥

अर्थ:

पत्नी के वचन कानों से सुनकर रावण खूब हँसा [और बोला--] अहो! मोह (अज्ञान) की महिमा बड़ी बलवान है! स्त्री का स्वभाव सब सत्य ही कहते हैं कि उसके हृदय में आठ अवगुण सदा रहते हैं--।

चौपाई

साहस अनृत चपलता माया। भय अबिबेक असौच अदाया॥ रिपु कर रूप सकल तैं गावा। अति बिसाल भय मोहि सुनावा॥ २ ॥

अर्थ:

साहस, अनृत, चपलता, माया (छल), भय (डरपोकपन), अविवेक (मूर्खता), अपवित्रता और निर्दयता। तूने शत्रु का समग्र (विराट) रूप गाया और मुझे उसका बड़ा भारी भय सुनाया।

चौपाई

सो सब प्रिया सहज बस मोरें। समुझि परा प्रसाद अब तोरें॥ जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई। एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई॥ ३ ॥

अर्थ:

हे प्रिये! वह सब (यह चराचर विश्व तो) स्वभाव से ही मेरे वश में है। तेरी कृपा से मुझे यह अब समझ पड़ा। हे प्रिये! तेरी चतुराई मैं जान गया। तू इस प्रकार (इसी बहाने) मेरी प्रभुता का बखान कर रही है।

चौपाई

तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि। समुझत सुखद सुनत भय मोचनि॥ मंदोदरि मन महुँ अस ठयऊ। पियहि काल बस मतिभ्रम भयऊ॥ ४ ॥

अर्थ:

हे मृगनयनी! तेरी बातें बड़ी गूढ़ (रहस्यभरी) हैं, समझने पर सुख देनेवाली और सुनने से भय छुड़ानेवाली हैं। मंदोदरी ने मन में ऐसा निश्चय कर लिया कि पति को कालवश मतिभ्रम हो गया है।

दोहा

एहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध। सहज असंक लंकपति सभाँ गयउ मद अंध॥ १६ (क) ॥

अर्थ:

इस प्रकार [अज्ञानवश] बहुत-से विनोद करते हुए रावण को सबेरा हो गया। तब स्वभाव से ही निडर और घमण्ड में अंधा लंकापति सभामें गया।

सोरठा

फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद। मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम॥ १६ (ख) ॥

अर्थ:

यद्यपि बादल अमृत-सा जल बरसाते हैं, तो भी बेत फूलता-फलता नहीं। इसी प्रकार चाहे ब्रह्मा के समान भी गुरु मिलें, तो भी मूर्ख के हृदय में चेत (ज्ञान) नहीं होता।

दोहा 17 के अंतर्गत
चौपाई

इहाँ प्रात जागे रघुराई। पूछा मत सब सचिव बोलाई॥ कहहु बेगि का करिअ उपाई। जामवंत कह पद सिरु नाई॥ १ ॥

अर्थ:

यहाँ (सुबेल पर्वत पर) प्रातःकाल श्रीरघुनाथजी जागे और उन्होंने सब मन्त्रियों को बुलाकर सलाह पूछी कि शीघ्र बताइये, अब क्या उपाय करना चाहिये? जाम्बवान ने श्रीरामजी के चरणों में सिर नवाकर कहा--।

चौपाई

सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी॥ मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालिकुमारा॥ २ ॥

अर्थ:

हे सर्वज्ञ (सब कुछ जाननेवाले)! हे सबके हृदय में बसनेवाले (अन्तर्यामी)! हे बुद्धि, बल, तेज, धर्म और गुणों की राशि! सुनिये! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार सलाह देता हूँ कि बालिकुमार अंगद को दूत बनाकर भेजा जाय।

चौपाई

नीक मंत्र सब के मन माना। अंगद सन कह कृपानिधाना॥ बालितनय बुधि बल गुन धामा। लंका जाहु तात मम कामा॥ ३ ॥

अर्थ:

यह अच्छी सलाह सब के मन में जँच गयी। कृपा के निधान श्रीरामजी ने अंगद से कहा--हे बल, बुद्धि और गुणों के धाम बालिपुत्र! हे तात! तुम मेरे काम के लिये लंका जाओ।

चौपाई

बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ। परम चतुर मैं जानत अहऊँ॥ काजु हमार तासु हित होई। रिपु सन करेहु बतकही सोई॥ ४ ॥

अर्थ:

तुमको बहुत समझाकर क्या कहूँ! मैं जानता हूँ, तुम परम चतुर हो। शत्रु से वही बातचीत करना जिससे हमारा काम हो और उसका कल्याण हो।

सोरठा

प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ। सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु॥ १७ (क) ॥

अर्थ:

प्रभु की आज्ञा सिर पर धरकर और उनके चरणों की वन्दना करके अंगद उठे [और बोले--] हे भगवान् श्रीरामजी! आप जिस पर कृपा करें, वही गुणों का समुद्र हो जाता है।

सोरठा

स्वयंसिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ। अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ॥ १७ (ख) ॥

अर्थ:

स्वामी के सब कार्य अपने-आप सिद्ध हैं; यह तो प्रभु ने मुझ को आदर दिया है [जो मुझे अपने कार्य पर भेज रहे हैं]। ऐसा विचार कर युवराज अंगद का हृदय हर्षित और शरीर पुलकित हो गया।