मंदोदरी का फिर रावण को समझाना और श्रीराम की महिमा कहना
मंदोदरी फिर रावण को समझाती है और श्रीराम की दिव्य महिमा बताती है। वह उसे विनाश से बचने के लिए नम्रता और विवेक अपनाने को कहती है।
लंकाकाण्ड · प्रकरण ७ / ३७
प्रकरण पाठ
पद पाताल सीस अज धामा। अपर लोक अँग अँग बिश्रामा॥ भृकुटि बिलास भयंकर काला। नयन दिवाकर कच घन माला॥ १ ॥
अर्थ:
पाताल [जिन विश्वरूप भगवान् का] चरण है, ब्रह्मलोक सिर है, अन्य (बीच के सब) लोकों का विश्राम (स्थिति) जिनके अन्य भिन्न-भिन्न अङ्गों पर है। भयङ्कर काल जिनका भृकुटि-संचालन (भौंहों का चलना) है। सूर्य नेत्र हैं, बादलों का समूह बाल है।
रोम राजि अष्टादस भारा। अस्थि सैल सरिता नस जारा॥ उदर उदधि अधगो जातना। जगमय प्रभु का बहु कलपना॥ ४ ॥
अर्थ:
अठारह प्रकार की असंख्य वनस्पतियाँ जिनकी रोमावली हैं, पर्वत अस्थियाँ हैं, नदियाँ नसों का जाल हैं, समुद्र पेट है और नरक जिनकी नीचे की इन्द्रियाँ हैं। इस प्रकार प्रभु विश्वमय हैं, अधिक कल्पना क्या की जाय ?
सो सब प्रिया सहज बस मोरें। समुझि परा प्रसाद अब तोरें॥ जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई। एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई॥ ३ ॥
अर्थ:
हे प्रिये! वह सब (यह चराचर विश्व तो) स्वभाव से ही मेरे वश में है। तेरी कृपा से मुझे यह अब समझ पड़ा। हे प्रिये! तेरी चतुराई मैं जान गया। तू इस प्रकार (इसी बहाने) मेरी प्रभुता का बखान कर रही है।
सुनु सर्बग्य सकल उर बासी। बुधि बल तेज धर्म गुन रासी॥ मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा। दूत पठाइअ बालिकुमारा॥ २ ॥
अर्थ:
हे सर्वज्ञ (सब कुछ जाननेवाले)! हे सबके हृदय में बसनेवाले (अन्तर्यामी)! हे बुद्धि, बल, तेज, धर्म और गुणों की राशि! सुनिये! मैं अपनी बुद्धि के अनुसार सलाह देता हूँ कि बालिकुमार अंगद को दूत बनाकर भेजा जाय।