लंकाकाण्ड

लंकाकाण्ड में धर्म और अधर्म का महायुद्ध, वानर सेना का पराक्रम और भगवान राम की रावण पर विजय का वर्णन है।

मुख्य प्रसंग: सेतु निर्माण · महायुद्ध · रावण वध

काण्ड ६ · ३७ प्रकरण

छंद संख्या

दोहे
१५०
सोरठा
चौपाइयाँ
५६८
छन्द
७०
श्लोक

लंकाकाण्ड के प्रकरण

प्रकरण १ / ३७

मंगलाचरण

लंका कांड के आरंभ में तुलसीदास जी गुरु, देवताओं और भगवन्नाम की वंदना करते हैं। यह प्रार्थनामय भूमिका पूरे कांड को मंगलमय और भक्तिभाव से ओतप्रोत करती है।

प्रकरण २ / ३७

नल-नील द्वारा पुल बाँधना, श्रीरामजी द्वारा श्रीरामेश्वर की स्थापना

नल-नील की सहायता से वानर सेना समुद्र पर सेतु का निर्माण करती है। प्रभु श्रीरामजी श्रीरामेश्वर की स्थापना कर आगे की विजययात्रा को पावन करते हैं।

प्रकरण ३ / ३७

श्रीरामजी का सेनासहित समुद्र पार उतरना, सुबेल पर्वत पर निवास, रावण की व्याकुलता

सेनासहित समुद्र पार कर श्रीरामजी सुबेल पर्वत पर निवास करते हैं। उधर लंका में अशुभ संकेतों से रावण व्याकुल हो उठता है।

प्रकरण ४ / ३७

रावण को मंदोदरी का समझाना, रावण-प्रहस्त-संवाद

मंदोदरी रावण को सीताजी को लौटाकर कल्याण का मार्ग अपनाने की सीख देती है। इसके बाद रावण और प्रहस्त के बीच युद्ध और नीति पर विचार होता है।

प्रकरण ५ / ३७

सुबेल पर श्रीरामजी की झाँकी और चंद्रोदय का वर्णन

सुबेल पर विराजमान श्रीरामजी की मनोहर झाँकी का दर्शन कराया गया है। साथ ही चंद्रोदय का सुंदर और भावपूर्ण वर्णन वातावरण को अलौकिक बना देता है।

प्रकरण ६ / ३७

श्रीरामजी के बाण से रावण के मुकुट और छत्रादि का गिरना

श्रीरामजी का बाण रावण के मुकुट और छत्रादि को भूमि पर गिरा देता है। इस लीला से रावण के अभिमान को गहरी चोट पहुँचती है।

प्रकरण ७ / ३७

मंदोदरी का फिर रावण को समझाना और श्रीराम की महिमा कहना

मंदोदरी फिर रावण को समझाती है और श्रीराम की दिव्य महिमा बताती है। वह उसे विनाश से बचने के लिए नम्रता और विवेक अपनाने को कहती है।

प्रकरण ८ / ३७

अंगदजी का लंका जाना और रावण की सभा में अंगद-रावण-संवाद

अंगदजी दूत बनकर लंका की सभा में पहुँचते हैं और निर्भय वचन कहते हैं। वे रावण को अंतिम बार सीताजी को लौटाने और श्रीरामजी की शरण ग्रहण करने का अवसर देते हैं।

प्रकरण ९ / ३७

रावण को पुनः मंदोदरी का समझाना

मंदोदरी पुनः रावण को नीति, धर्म और परिणाम का स्मरण कराती है। किन्तु रावण मोह और अहंकारवश उसकी बात नहीं मानता।

प्रकरण १० / ३७

अंगद-राम-संवाद

लंका से लौटकर अंगदजी श्रीरामजी को वहाँ की स्थिति सुनाते हैं। उनके बीच रावण की हठ और आगे की युद्धनीति पर संवाद होता है।

प्रकरण ११ / ३७

युद्धारम्भ

वानर और राक्षस सेनाएँ आमने-सामने आती हैं और महासंग्राम आरंभ होता है। रणभूमि में पराक्रम, गर्जना और दिव्य उत्साह छा जाता है।

प्रकरण १२ / ३७

माल्यवान का रावण को समझाना

वयोवृद्ध माल्यवान रावण को उचित परामर्श देते हुए संधि और विवेक का मार्ग सुझाते हैं। रावण फिर भी अपने दुराग्रह से पीछे नहीं हटता।

प्रकरण १३ / ३७

लक्ष्मण-मेघनाद युद्ध, लक्ष्मणजी को शक्ति लगना

लक्ष्मणजी और मेघनाद के बीच घोर युद्ध होता है। अंत में मेघनाद की शक्ति लगने से लक्ष्मणजी मूर्च्छित होकर गिर पड़ते हैं।

प्रकरण १४ / ३७

हनुमानजी का सुषेण वैद्य को लाना एवं संजीवनी के लिये जाना, कालनेमि-रावण-संवाद, मकरी-उद्धार, कालनेमि-उद्धार

हनुमानजी सुषेण वैद्य को ले आते हैं और संजीवनी लाने के लिए तुरंत प्रस्थान करते हैं। मार्ग में कालनेमि की माया का भेदन, मकरी का उद्धार और कालनेमि का अंत होता है।

प्रकरण १५ / ३७

भरतजी के बाण से हनुमान का मूर्च्छित होना, भरत-हनुमान-संवाद

औषधि लेकर लौटते समय हनुमान पर भरतजी का बाण लगता है और वे क्षणभर के लिए मूर्च्छित हो जाते हैं। फिर दोनों का अत्यंत भावपूर्ण संवाद होता है और भरतजी प्रभु का समाचार सुनते हैं।

प्रकरण १६ / ३७

श्रीरामजी की प्रलापलीला, हनुमानजी का लौटना, लक्ष्मणजी का उठ बैठना

लक्ष्मणजी की दशा देखकर श्रीरामजी करुण प्रलाप करते हैं। तभी हनुमानजी लौटते हैं, औषधि का प्रभाव होता है और लक्ष्मणजी उठ बैठते हैं।

प्रकरण १७ / ३७

रावण का कुंभकर्ण को जगाना, कुंभकर्ण का रावण को उपदेश और विभीषण-कुंभकर्ण-संवाद

रावण कुंभकर्ण को जगाकर युद्ध के लिए प्रेरित करता है। कुंभकर्ण उसे कठोर सत्य सुनाता है और विभीषण से भी अर्थपूर्ण संवाद करता है।

प्रकरण १८ / ३७

कुंभकर्ण युद्ध और उसकी परमगति

कुंभकर्ण रणभूमि में प्रचंड पराक्रम दिखाता है और वानर सेना में हलचल मचा देता है। अंततः श्रीरामजी के हाथों उसका उद्धार होकर उसे परमगति प्राप्त होती है।

प्रकरण १९ / ३७

मेघनाद का युद्ध, रामजी का लीला से नागपाश में बँधना

मेघनाद मायावी युद्ध करता है और लीला से रामजी को नागपाश में बाँध देता है। यह दृश्य देवताओं और वानर सेना में क्षणिक विषाद उत्पन्न करता है।

प्रकरण २० / ३७

मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस, युद्ध और मेघनाद का उद्धार

मेघनाद के यज्ञ का विध्वंस कर उसे अपूर्ण कर दिया जाता है। फिर भीषण युद्ध में उसका अंत होता है और प्रभु की कृपा से उसका उद्धार होता है।

प्रकरण २१ / ३७

रावण का युद्ध के लिये प्रस्थान, श्रीरामजी का विजय रथ और वानर-राक्षसों का युद्ध

रावण स्वयं युद्ध के लिए प्रस्थान करता है और उधर श्रीरामजी के विजय रथ का महात्म्य प्रकट होता है। वानर और राक्षसों के बीच संग्राम और अधिक उग्र हो उठता है।

प्रकरण २२ / ३७

लक्ष्मण-रावण युद्ध

लक्ष्मणजी और रावण के बीच तीव्र युद्ध छिड़ता है। दोनों ओर से चलने वाले अस्त्र-शस्त्र रणभूमि को विकराल बना देते हैं।

प्रकरण २३ / ३७

रावण की मूर्च्छा, रावण के यज्ञ का विध्वंस, राम-रावण युद्ध

रावण मूर्च्छित होता है और उसकी विजयकामी साधना भी विफल कर दी जाती है। इसके बाद राम और रावण का महायुद्ध पुनः प्रखर रूप में सामने आता है।

प्रकरण २४ / ३७

इंद्र का श्रीरामजी के लिये रथ भेजना, राम-रावण युद्ध

देवराज इंद्र श्रीरामजी के लिए दिव्य रथ और सारथि भेजते हैं। उस पर आरूढ़ होकर प्रभु राम रावण से और भी प्रचंड युद्ध करते हैं।

प्रकरण २५ / ३७

रावण का विभीषण पर शक्ति छोड़ना, रामजी का शक्ति को अपने ऊपर लेना, विभीषण-रावण युद्ध

रावण विभीषण पर शक्ति चलाता है, पर रामजी उसे अपने ऊपर ले लेते हैं। भक्त-रक्षा की यह लीला देख विभीषण पुनः युद्ध में प्रवृत्त होते हैं।

प्रकरण २६ / ३७

रावण-हनुमान युद्ध, रावण की मायारचना और रामजी द्वारा माया नाश

हनुमानजी निर्भय होकर रावण से युद्ध करते हैं। रावण अपनी मायावी रचनाएँ फैलाता है, पर रामजी उन्हें तत्काल नष्ट कर देते हैं।

प्रकरण २७ / ३७

घोर युद्ध, रावण की मूर्छा

युद्ध अत्यन्त उग्र हो उठता है और रामजी के प्रहारों से रावण मूर्छित हो जाता है। फिर भी अहंकारवश वह पुनः संभलकर रणभूमि में डटा रहता है।

प्रकरण २८ / ३७

त्रिजटा-सीता संवाद

अशोक वाटिका में त्रिजटा सीताजी को युद्ध के समाचार सुनाती है और उन्हें धैर्य बँधाती है। वह आश्वस्त करती है कि रामजी की विजय और मिलन अब निकट है।

प्रकरण २९ / ३७

राम-रावण युद्ध, रावण वध, सर्वत्र जयध्वनि

रामजी और रावण के बीच निर्णायक युद्ध होता है। प्रभु के अमोघ बाण से रावण का अंत होता है और चारों ओर विजय की जयध्वनि गूँज उठती है।

प्रकरण ३० / ३७

मन्दोदरी विलाप, रावण की अन्त्येष्टि क्रिया

रावण के पतन पर मन्दोदरी गहन शोक करती है और उसके अहंकार के दुष्परिणाम को पहचानती है। रामजी की आज्ञा से विभीषण विधिपूर्वक उसकी अन्त्येष्टि क्रिया सम्पन्न करते हैं।

प्रकरण ३१ / ३७

विभीषण का राज्याभिषेक

रामजी की कृपा से विभीषण का लंका के राजा के रूप में राज्याभिषेक होता है। अधर्म से पीड़ित लंका में धर्म और नीति की स्थापना का आरम्भ होता है।

प्रकरण ३२ / ३७

हनुमानजी का सीताजी को कुशल सुनाना, सीताजी का आगमन और अग्नि परीक्षा

हनुमानजी अशोक वाटिका में पहुँचकर सीताजी को रामजी की कुशल और विजय का समाचार सुनाते हैं। इसके बाद सीताजी सम्मान सहित लाई जाती हैं और अग्नि परीक्षा के द्वारा उनकी पवित्रता समस्त लोक के सामने प्रकट होती है।

प्रकरण ३३ / ३७

देवताओं की स्तुति, इन्द्र की अमृत वर्षा

देवता रामजी की विजय पर स्तुति करते हुए उनके दिव्य स्वरूप का गुणगान करते हैं। इन्द्र अमृत वर्षा करके रणभूमि में गिरे वानरों और भालुओं को पुनर्जीवन देते हैं।

प्रकरण ३४ / ३७

विभीषण की प्रार्थना, श्रीरामजी द्वारा भरतजी की प्रेमदशा का वर्णन, और शीघ्र अयोध्या पहुँचने का अनुरोध

विभीषण विनयपूर्वक प्रभु से कुछ समय लंका में ठहरने की प्रार्थना करते हैं। श्रीरामजी भरतजी की विरहपूर्ण प्रेमदशा का वर्णन करते हुए शीघ्र अयोध्या पहुँचने की अपनी आतुरता प्रकट करते हैं।

प्रकरण ३५ / ३७

विभीषण का वस्त्राभूषण बरसाना और वानरों तथा भालुओं का उन्हें पहनना

विभीषण आभार स्वरूप वस्त्र और आभूषण बरसाते हैं। वानर और भालू उन्हें बड़े हर्ष और सरलता से धारण कर आनंदित होते हैं।

प्रकरण ३६ / ३७

पुष्पक विमान पर चढ़कर श्रीसीता-रामजी का अवध के लिये प्रस्थान

श्रीसीता-रामजी पुष्पक विमान पर आरूढ़ होकर अवध की ओर प्रस्थान करते हैं। उनके साथ सभी प्रेममय सहचर विजय के बाद घर लौटने की आनंदमयी यात्रा आरम्भ करते हैं।

प्रकरण ३७ / ३७

श्रीरामचरित की महिमा

इस समापन भाग में श्रीरामचरित के श्रवण और मनन की महिमा कही गई है। भक्तिभाव से इसका पाठ करने पर भय, शोक और दोष दूर होकर मंगल की प्राप्ति होती है।