जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन
जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन
दोहा १९ · लंकाकाण्ड
दोहा पाठ
जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ। राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ॥ १९ ॥
अर्थ
जैसे मतवाले हाथियों के झुंड में सिंह [निःशल्क होकर] चला जाता है, वैसे ही श्रीरामजी के प्रताप का हृदय में स्मरण करके वे [निर्भय] सभामें सिर नवाकर बैठ गये।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का दोहा १९ है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
अंगद का लंका में रावण से संवाद