उमा राम की भृकुटि बिलासा
उमा राम की भृकुटि बिलासा
चौपाई ४, दोहा ३५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
उमा राम की भृकुटि बिलासा। होइ बिस्व पुनि पावइ नासा॥ तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई। तासु दूत पन कहु किमि टरई॥ ४ ॥
अर्थ
[शिवजी कहते हैं--] हे उमा! जिन श्रीरामचन्द्रजी के भृकुटि-विलास (भौंह के इशारे) से विश्व उत्पन्न होता है और फिर नाश को प्राप्त होता है; जो तृण को वज्र और वज्र को तृण बना देते हैं (अत्यन्त निर्बल को महान् प्रबल और महान् प्रबल को अत्यन्त निर्बल कर देते हैं), उनके दूत का प्रण, कहो, कैसे टल सकता है?
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
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अंगद का लंका में रावण से संवाद