तैं निसिचरपति गर्ब बहूता

चौपाई ४, दोहा ३० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

तैं निसिचरपति गर्ब बहूता। मैं रघुपति सेवक कर दूता॥ जौं न राम अपमानहि डरऊँ। तोहि देखत अस कौतुक करऊँ॥ ४ ॥

अर्थ

तू राक्षसों का राजा और बड़ा अभिमानी है। परन्तु मैं तो श्रीरघुनाथजी के सेवक (सुग्रीव) का दूत (सेवक का भी सेवक) हूँ। यदि मैं श्रीरामजी के अपमान से न डरूँ तो तेरे देखते-देखते ऐसा तमाशा करूँ कि--।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद