एक कहत मोहि सकुच अति रहा
एक कहत मोहि सकुच अति रहा
दोहा २४ · लंकाकाण्ड
दोहा पाठ
एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि कीं काँख। इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख॥ २४ ॥
अर्थ
एक रावण की बात कहने में तो मुझे बड़ा संकोच हो रहा है--वह [बहुत दिनों तक] बालि की काँख में रहा था। इनमें से तुम कौन-से रावण हो ? खीझना छोड़कर सच-सच बताओ।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का दोहा २४ है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
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अंगद का लंका में रावण से संवाद