कटकटान कपिकुंजर भारी

चौपाई २, दोहा ३२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

कटकटान कपिकुंजर भारी। दुहु भुजदंड तमकि महि मारी॥ डोलत धरनि सभासद खसे। चले भाजि भय मारुत ग्रसे॥ २ ॥

अर्थ

वानरश्रेष्ठ अंगद बहुत जोर से कटकटाये (शब्द किया) और उन्होंने तमककर (जोर से) अपने दोनों भुजदण्डों को पृथ्वी पर दे मारा। पृथ्वी हिलने लगी, [जिससे बैठे हुए] सभासद् गिर पड़े और भय से ग्रस्त होकर भाग चले।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद