भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत
भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत
दोहा ३४ (ख) · लंकाकाण्ड
दोहा पाठ
भूमि न छाँड़त कपि चरन देखत रिपु मद भाग। कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग॥ ३४ (ख) ॥
अर्थ
जैसे करोड़ों विघ्न आने पर भी संत का मन नीति को नहीं छोड़ता, वैसे ही वानर (अंगद) का चरण पृथ्वी को नहीं छोड़ता। यह देखकर शत्रु (रावण) का मद भाग गया।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का दोहा ३४ (ख) है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
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अंगद का लंका में रावण से संवाद