कह कपि धर्मसीलता तोरी
कह कपि धर्मसीलता तोरी
चौपाई ३, दोहा २२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
कह कपि धर्मसीलता तोरी। हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी॥ देखी नयन दूत रखवारी। बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी॥ ३ ॥
अर्थ
अंगद ने कहा--तुम्हारी धर्मशीलता मैंने भी सुनी है। [वह यह कि] तुमने परायी स्त्री की चोरी की है! और दूत की रखवारी की बात तो अपनी आँखों से देख ली। ऐसे धर्म के ब्रत को धारण करनेवाले तुम डूबकर मर नहीं जाते!
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
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अंगद का लंका में रावण से संवाद