गहसि न राम चरन सठ जाई

चौपाई २, दोहा ३५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

गहसि न राम चरन सठ जाई। सुनत फिरा मन अति सकुचाई॥ भयउ तेजहत श्री सब गई। मध्य दिवस जिमि ससि सोहई॥ २ ॥

अर्थ

ओरे मूर्ख! तू जाकर श्रीरामजी के चरण क्यों नहीं पकड़ता? यह सुनकर वह मन में बहुत ही सकुचाकर लौट गया। उसकी सारी श्री जाती रही। वह ऐसा तेजहीन हो गया जैसे मध्य दिवस में चन्द्रमा दिखायी देता है।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद