कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू

चौपाई ५, दोहा ३२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू। लूक न असनि केतु नहिं राहू॥ ए किरीट दसकंधर केरे। आवत बालितनय के प्रेरे॥ ५ ॥

अर्थ

प्रभु ने [उनसे] हँसकर कहा-मन में डरो नहीं। ये न उल्का हैं, न वज्र हैं और न केतु या राहु ही हैं। अरे भाई! ये तो रावण के मुकुट हैं; जो बालिपुत्र अंगद के फेंके हुए आ रहे हैं।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ३२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद