सिंघासन बैठेउ सिर नाई

चौपाई ३, दोहा ३५ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

सिंघासन बैठेउ सिर नाई। मानहुँ संपति सकल गँवाई॥ जगदातमा प्रानपति रामा। तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा॥ ३ ॥

अर्थ

वह सिर नीचा करके सिंहासन पर जा बैठा। मानो सारी सम्पत्ति गँवाकर बैठा हो। श्रीरामचन्द्रजी जगत् भर के आत्मा और प्राणों के स्वामी हैं। उनसे विमुख रहने वाला शान्ति कैसे पा सकता है?

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद