पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा
पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा
चौपाई २, दोहा ३३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा। गाल बजावत तोहि न लाजा॥ मरु गर काटि निलज कुलघाती। बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती॥ २ ॥
अर्थ
युवराज अंगद क्रोधित होकर बोले--तुझे गाल बजाते लाज नहीं आती! अरे निर्लज्ज! अरे कुलघाती! गला काटकर मर जा! मेरा बल देखकर भी क्या तेरी छाती नहीं फटती!
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
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अंगद का लंका में रावण से संवाद