जौं मम चरन सकसि सठ टारी

चौपाई ५, दोहा ३४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

जौं मम चरन सकसि सठ टारी। फिरहिं रामु सीता मैं हारी॥ सुनहु सुभट सब कह दससीसा। पद गहि धरनि पछारहु कीसा॥ ५ ॥

अर्थ

[और कहा--] अरे मूर्ख! यदि तू मेरा चरण हटा सके तो श्रीरामजी लौट जाएँगे, मैं सीताजी को हार गया। रावण ने कहा--हे सब वीरों! सुनो, पैर पकड़कर बंदर को पृथ्वी पर पछाड़ दो।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद