सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई

चौपाई ४, दोहा २४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई। दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई॥ देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा। तुम्हरें लाज न रोष न माखा॥ ४ ॥

अर्थ

तुम्हारा वही सुन्दर स्वभाव विचारकर, हे दशकंधर ! मैंने कुछ धृष्टता की है। हनुमान ने जो कुछ कहा था, उसे आकर मैंने प्रत्यक्ष देख लिया कि तुम्हें न लज्जा है, न क्रोध है और न चिढ़ है।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद