तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे

दोहा ३२ (क) · लंकाकाण्ड

दोहा पाठ

तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास। कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास॥ ३२ (क) ॥

अर्थ

पवनपुत्र श्रीहनुमानजी ने उछलकर उन्हें हाथ से पकड़ लिया और लाकर प्रभु के पास रख दिया। रीछ और वानर तमाशा देखने लगे। उनका प्रकाश सूर्य के समान था।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का दोहा ३२ (क) है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद