नाहिं त करि मुख भंजन तोरा

चौपाई ३, दोहा ३० के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

नाहिं त करि मुख भंजन तोरा। लै जातेउँ सीतहि बरजोरा॥ जानेउँ तव बल अधम सुरारी। सूनें हरि आनिहि परनारी॥ ३ ॥

अर्थ

नहीं तो तेरे मुँह तोड़कर मैं सीता जी को जबरदस्ती ले जाता। अरे अधम! देवताओं के शत्रु! तेरा बल तो मैंने तभी जान लिया जब तू सूने में परायी स्त्री को हर (चुरा) लाया।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद