पुनि उठि झपटहिं सुर आराती
पुनि उठि झपटहिं सुर आराती
चौपाई ७, दोहा ३४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
पुनि उठि झपटहिं सुर आराती। टरइ न कीस चरन एहि भाँती॥ पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी। मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी॥ ७ ॥
अर्थ
[काकभुशुण्डिजी कहते हैं--] वे देवताओं के शत्रु (राक्षस) फिर उठकर झपटते हैं। परन्तु हे सर्पों के शत्रु गरुड़जी! अंगद का चरण उनसे वैसे ही नहीं टलता जैसे कुयोगी (विषयी) पुरुष मोह-रूपी वृक्ष को नहीं उखाड़ सकते।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ७, दोहा ३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।
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अंगद का लंका में रावण से संवाद