जुगुति सुनत रावन मुसुकाई

चौपाई ३, दोहा ३४ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

जुगुति सुनत रावन मुसुकाई। मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई॥ बालि न कबहुँ गाल अस मारा। मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा॥ ३ ॥

अर्थ

अंगद की युक्ति सुनकर रावण मुसकराया [और बोला--] ओरे मूर्ख! बहुत झूठ बोलना तूने कहाँ सीखा? बालि ने तो कभी ऐसा गाल नहीं मारा। जान पड़ता है तू तपस्वियों से मिलकर लबारा हो गया है।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
अंगद का लंका में रावण से संवाद