जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला

चौपाई १, दोहा २९ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

चौपाई पाठ

जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला। बिधि के लिखे अंक निज भाला॥ नर कें कर आपन बध बाँची। हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची॥ १ ॥

अर्थ

मस्तकों के जलते समय जब मैंने विधाताके लिखे हुए अंक अपने ललाट पर देखे, तब मनुष्यके हाथसे अपनी मृत्यु होना बाँचकर, विधाताकी वाणी (लेख को) असत्य जानकर मैं हँसा।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “अंगद का लंका में रावण से संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद का लंका की सभा में रावण को सीता लौटाने और राम की शरण लेने का अंतिम अवसर देने का वर्णन है।

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अंगद का लंका में रावण से संवाद