प्रतापभानु की कथा
राजा प्रतापभानु छलपूर्वक विपथित होते हैं और ब्राह्मणों के शाप से उनके भाग्य की दिशा बदल जाती है। यही कथा आगे रावण आदि के जन्म की पृष्ठभूमि बनती है।
बालकाण्ड · प्रकरण ३३ / ५९
प्रकरण पाठ
सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे। लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हे॥ सकल अवनि मंडल तेहि काला। एक प्रतापभानु महिपाला॥ ४ ॥
अर्थ:
अपनी भुजाओं के बल से उसने सातों द्वीपों (भूमिखण्डों) को वश में कर लिया और राजाओं से दण्ड (कर) ले-लेकर उन्हें छोड़ दिया। सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डल का उस समय प्रतापभानु ही एकमात्र (चक्रवर्ती) राजा था।
हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना। भूप बिबेकी परम सुजाना॥ करइ जे धरम करम मन बानी। बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी॥ १ ॥
अर्थ:
[राजा के] हृदय में किसी फल की टोह (कामना) न थी। राजा बड़ा ही बुद्धिमान् और ज्ञानी था। वह ज्ञानी राजा कर्म, मन और वाणी से जो कुछ भी धर्म करता था, सब भगवान् वासुदेव को अर्पित करके करता था।
फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू॥ बड़ बिधु नहिं समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोध बस उगिलत नाहीं॥ ३ ॥
अर्थ:
राजा ने वन में फिरते हुए एक सूअर को देखा। [दाँतों के कारण वह ऐसा दीख पड़ता था] मानो चन्द्रमा को ग्रसकर (मुँह में पकड़कर) राहु वन में आ छिपा हो। चन्द्रमा बड़ा होने से उसके मुँह में समाता नहीं है और मानो क्रोधवश वह भी उसे उगलता नहीं है।
राउ तृषित नहिं सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना॥ उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा। परम चतुर न कहेउ निज नामा॥ ४ ॥
अर्थ:
राजा प्यासा होने के कारण [व्याकुलता में] उसे पहचान न सका। सुन्दर वेष देखकर राजा ने उसे महामुनि समझा और घोड़े से उतरकर उसे प्रणाम किया। परन्तु बड़ा चतुर होने के कारण राजा ने उसे अपना नाम नहीं बतलाया।
नाम प्रतापभानु अवनीसा। तासु सचिव मैं सुनहु मुनीसा॥ फिरत अहेरें परेउँ भुलाई। बड़ें भाग देखेउँ पद आई॥ ३ ॥
अर्थ:
[राजाने कहा--] हे मुनीश्वर! सुनिये, प्रतापभानु नाम का एक राजा है, मैं उसका मन्त्री हूँ। शिकार के लिये फिरते हुए राह भूल गया हूँ। बड़े भाग्य से यहाँ आकर मैंने आपके चरणों के दर्शन पाये हैं।
भलेहिं नाथ आयसु धरि सीसा। बाँधि तुरग तरु बैठ महीसा॥ नृप बहु भाँति प्रसंसेउ ताही। चरन बंदि निज भाग्य सराही॥ १ ॥
अर्थ:
हे नाथ! बहुत अच्छा, ऐसा कहकर और उसकी आज्ञा सिर चढ़ाकर, घोड़े को वृक्ष से बाँधकर राजा बैठ गया। राजा ने उसकी बहुत प्रकार से प्रशंसा की और उसके चरणों की वन्दना करके अपने भाग्य की सराहना की।
तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना। भूप सुहृद सो कपट सयाना॥ बैरी पुनि छत्री पुनि राजा। छल बल कीन्ह चहइ निज काजा॥ ३ ॥
अर्थ:
राजा उसे नहीं पहचानता था, पर वह राजा को पहचान गया था। राजा तो शुद्ध हृदय था और वह कपट करने में चतुर था। एक तो बैरी, फिर जाति का क्षत्रिय, फिर राजा। वह छल-बल से अपना काम बनाना चाहता था।
कह नृप जे बिग्यान निधाना। तुम्ह सारिखे गलित अभिमाना॥ सदा रहहिं अपनपौ दुराएँ। सब बिधि कुसल कुबेष बनाएँ॥ १ ॥
अर्थ:
राजाने कहा--जो आपके सदृश विज्ञान के निधान और सर्वथा अभिमानरहित होते हैं, वे अपने स्वरूप को सदा छिपाये रहते हैं। क्योंकि कुवेष बनाकर रहने में ही सब तरह का कल्याण है (प्रकट संतवेष में मान होने की सम्भावना है और मान से पतन की)।
तेहि तें कहहिं संत श्रुति टेरें। परम अकिंचन प्रिय हरि केरें॥ तुम्ह सम अधन भिखारि अगेहा। होत बिरंचि सिवहि संदेहा॥ २ ॥
अर्थ:
इसीसे तो संत और वेद पुकारकर कहते हैं कि परम अकिंचन (सर्वथा अहंकार, ममता और मानरहित) ही भगवान् को प्रिय होते हैं। आप-सरीखे निर्धन, भिखारी और गृहहीनों को देखकर ब्रह्मा और शिवजी को भी सन्देह हो जाता है [कि वे वास्तविक संत हैं या भिखारी ]।
जोसि सोसि तव चरन नमामी। मो पर कृपा करिअ अब स्वामी॥ सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी॥ ३ ॥
अर्थ:
आप जो हों सो हों (अर्थात् जो कोई भी हों), मैं आपके चरणों में नमस्कार करता हूँ। हे स्वामी! अब मुझ पर कृपा कीजिये। अपने ऊपर राजा की स्वाभाविक प्रीति और अपने विषय में उसका अधिक विश्वास देखकर--।
तुम्ह सुचि सुमति परम प्रिय मोरें। प्रीति प्रतीति मोहि पर तोरें॥ अब जौं तात दुरावउँ तोही। दारुन दोष घटइ अति मोही॥ २ ॥
अर्थ:
तुम पवित्र और सुन्दर बुद्धिवाले हो, इससे मुझे बहुत ही प्यारे हो और तुम्हारी भी मुझ पर प्रीति और विश्वास है। हे तात! अब यदि मैं तुमसे कुछ छिपाता हूँ तो मुझ पर बहुत ही भयानक दोष लगेगा।
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा॥ देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी॥ ३ ॥
अर्थ:
ज्यों-ज्यों वह तपस्वी उदासीनता की बातें कहता था, त्यों-ही-त्यों राजा को विश्वास उत्पन्न होता जाता था। जब उस बगुले की तरह ध्यान लगाने वाले (कपटी) मुनि ने राजा को कर्म, मन और वचन से अपने वश में जाना, तब वह बोला--।
देखि तात तव सहज सुधाई। प्रीति प्रतीति नीति निपुनाई॥ उपजि परी ममता मन मोरें। कहउँ कथा निज पूछे तोरें॥ २ ॥
अर्थ:
हे तात! तुम्हारा स्वाभाविक सीधापन (सरलता), प्रेम, विश्वास और नीति में निपुणता देखकर मेरे मन में तुम्हारे ऊपर बड़ी ममता उत्पन्न हो गयी है; इसीलिए मैं तुम्हारे पूछने पर अपनी कथा कहता हूँ।
तपबल बिप्र सदा बरिआरा। तिन्ह के कोप न कोउ रखवारा॥ जौं बिप्रन्ह बस करहु नरेसा। तौ तुअ बस बिधि बिष्नु महेसा॥ २ ॥
अर्थ:
तप के बल से ब्राह्मण सदा बलवान रहते हैं। उनके क्रोध से रक्षा करने वाला कोई नहीं है। हे नरपति! यदि तुम ब्राह्मणों को वश में कर लो, तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी तुम्हारे अधीन हो जायेंगे।
सत्य नाथ पद गहि नृप भाषा। द्विज गुर कोप कहहु को राखा॥ राखइ गुर जौं कोप बिधाता। गुर बिरोध नहिं कोउ जग त्राता॥ ३ ॥
अर्थ:
राजा ने मुनि के चरण पकड़कर कहा—हे स्वामी! सत्य ही है। ब्राह्मण और गुरु के क्रोध से, कहिये, कौन रक्षा कर सकता है? यदि ब्रह्मा भी क्रोध करें, तो गुरु बचा लेते हैं; पर गुरु से विरोध करने पर जगत में कोई भी बचाने वाला नहीं है।
जौं न चलब हम कहे तुम्हारें। होउ नास नहिं सोच हमारें॥ एकहिं डर डरपत मन मोरा। प्रभु महिदेव श्राप अति घोरा॥ ४ ॥
अर्थ:
यदि मैं आपके कथन के अनुसार नहीं चलूँगा, तो [भले ही] मेरा नाश हो जाय। मुझे इसकी चिन्ता नहीं है। मेरा मन तो हे प्रभो! [केवल] एक ही डर से डर रहा है कि महिदेव का शाप बड़ा भयानक होता है।
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं। गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं॥ जलधि अगाध मौलि बह फेनू। संतत धरनि धरत सिर रेनू॥ ४ ॥
अर्थ:
बड़े लोग छोटों पर स्नेह करते ही हैं। पर्वत अपने सिरों पर सदा तृण (घास) को धारण किये रहते हैं। अगाध समुद्र अपने मस्तक पर फेन को धारण करता है, और धरती अपने सिर पर सदा धूलि को धारण किये रहती है।
एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें॥ करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥ १ ॥
अर्थ:
हे राजन्! इस प्रकार बहुत ही थोड़े परिश्रम से सब ब्राह्मण तुम्हारे वश में हो जायँगे। ब्राह्मण हवन, यज्ञ और सेवा-पूजा करेंगे, तो उस प्रसंग (सम्बन्ध) से देवता भी सहज ही वश में हो जायँगे।
तेहि के सत सुत अरु दस भाई। खल अति अजय देव दुखदाई॥ प्रथमहिं भूप समर सब मारे। बिप्र संत सुर देखि दुखारे॥ ३ ॥
अर्थ:
उसके सौ पुत्र और दस भाई थे, जो बड़े ही दुष्ट, किसी से न जीते जानेवाले और देवताओं को दुःख देनेवाले थे। ब्राह्मणों, संतों और देवताओं को दुखी देखकर राजा ने उन सबको पहले ही युद्ध में मार डाला था।
अब साधेउँ रिपु सुनहु नरेसा। जौं तुम्ह कीन्ह मोर उपदेसा॥ परिहरि सोच रहहु तुम्ह सोई। बिनु औषध बिआधि बिधि खोई॥ २ ॥
अर्थ:
हे राजन्! सुनो, जब तुमने मेरे कहने के अनुसार [इतना] काम कर लिया, तो अब मैंने शत्रु को काबू में कर ही लिया [समझो]। तुम अब चिन्ता त्याग सो रहो। विधाता ने बिना ही दवा के रोग दूर कर दिया।
जुग सम नृपहि गए दिन तीनी। कपटी मुनि पद रह मति लीनी॥ समय जानि उपरोहित आवा। नृपहि मते सब कहि समुझावा॥ ४ ॥
अर्थ:
राजा को तीन दिन युग के समान बीते। उसकी बुद्धि कपटी मुनि के चरणों में लगी रही। निश्चित समय जानकर पुरोहित [बना हुआ राक्षस] आया और राजा के साथ की हुई गुप्त सलाह के अनुसार [उसने अपने] सब विचार उसे समझाकर कह दिये।
भयउ रसोईं भूसुर माँसू। सब द्विज उठे मानि बिस्वासू॥ भूप बिकल मति मोहँ भुलानी। भावी बस आव मुख बानी॥ ४ ॥
अर्थ:
रसोई में ब्राह्मणों का मांस बना है। [आकाशवाणी का] विश्वास मानकर सब ब्राह्मण उठ खड़े हुए। राजा व्याकुल हो गया। [परन्तु] उसकी बुद्धि मोह में भूली हुई थी। होनहारवश उसके मुँह से [एक] बात [भी] न निकली।