समुझि राजसुख दुखित अराती
समुझि राजसुख दुखित अराती
चौपाई ४, दोहा १६० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
समुझि राजसुख दुखित अराती। अवाँ अनल इव सुलगइ छाती॥ सरल बचन नृप के सुनि काना। बयर सँभारि हृदयँ हरषाना॥ ४ ॥
अर्थ
वह शत्रु अपने राज-सुख को समझ कर दुखी था। उसकी छाती [कुम्हार के] आँवे की आग की तरह [भीतर-ही-भीतर] सुलग रही थी। राजा के सरल वचन कान से सुनकर, अपने वैर को याद कर वह हृदय में हर्षित हुआ।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “प्रतापभानु की कथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १६० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा प्रतापभानु के छल द्वारा विपथित होने और ब्राह्मण-शाप से उनके विनाश का वर्णन है।
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प्रतापभानु की कथा