तातें गुपुत रहउँ जग माहीं
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं
चौपाई १, दोहा १६२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
तातें गुपुत रहउँ जग माहीं। हरि तजि किमपि प्रयोजन नाहीं॥ प्रभु जानत सब बिनहिं जनाएँ। कहहु कवनि सिधि लोक रिझाएँ॥ १ ॥
अर्थ
इसीसे मैं जगत् में छिपकर रहता हूँ। श्रीहरि को छोड़कर किसी से कुछ भी प्रयोजन नहीं रखता। प्रभु तो बिना जनाये ही सब जानते हैं। फिर कहो, संसार को रिझाने से क्या सिद्धि मिलेगी।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “प्रतापभानु की कथा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १६२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा प्रतापभानु के छल द्वारा विपथित होने और ब्राह्मण-शाप से उनके विनाश का वर्णन है।
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प्रतापभानु की कथा