भाइहि भाइहि परम समीती

चौपाई ४, दोहा १५३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

भाइहि भाइहि परम समीती। सकल दोष छल बरजित प्रीती॥ जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा। हरि हित आपु गवन बन कीन्हा॥ ४ ॥

अर्थ

भाई-भाई में बड़ा मेल और सब प्रकार के दोषों और छलों से रहित [सच्ची] प्रीति थी। राजा ने जेठे पुत्र को राज्य दे दिया और आप भगवान् [के भजन] के लिये वन को चल दिया।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “प्रतापभानु की कथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १५३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा प्रतापभानु के छल द्वारा विपथित होने और ब्राह्मण-शाप से उनके विनाश का वर्णन है।

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प्रतापभानु की कथा