फिरत बिपिन नृप दीख बराहू
फिरत बिपिन नृप दीख बराहू
चौपाई ३, दोहा १५६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
फिरत बिपिन नृप दीख बराहू। जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू॥ बड़ बिधु नहिं समात मुख माहीं। मनहुँ क्रोध बस उगिलत नाहीं॥ ३ ॥
अर्थ
राजा ने वन में फिरते हुए एक सूअर को देखा। [दाँतों के कारण वह ऐसा दीख पड़ता था] मानो चन्द्रमा को ग्रसकर (मुँह में पकड़कर) राहु वन में आ छिपा हो। चन्द्रमा बड़ा होने से उसके मुँह में समाता नहीं है और मानो क्रोधवश वह भी उसे उगलता नहीं है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “प्रतापभानु की कथा” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १५६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा प्रतापभानु के छल द्वारा विपथित होने और ब्राह्मण-शाप से उनके विनाश का वर्णन है।
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प्रतापभानु की कथा