कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें

चौपाई ४, दोहा १६४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

कृपासिंधु मुनि दरसन तोरें। चारि पदारथ करतल मोरें॥ प्रभुहि तथापि प्रसन्न बिलोकी। मागि अगम बर होउँ असोकी॥ ४ ॥

अर्थ

हे कृपासिंधु मुनि! आपके दर्शन से ही चारों पदार्थ (अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष) मेरी मुट्ठी में आ गये। तो भी स्वामी को प्रसन्न देखकर मैं यह दुर्लभ वर माँगकर शोक रहित हो जाऊँ।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “प्रतापभानु की कथा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १६४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राजा प्रतापभानु के छल द्वारा विपथित होने और ब्राह्मण-शाप से उनके विनाश का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
प्रतापभानु की कथा