नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस
नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस
दोहा १७२ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत। बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत॥ १७२ ॥
अर्थ
[संकेत के अनुसार] गुरु को [उस रूप में] पहचानकर राजा प्रसन्न हुआ। भ्रमवश उसे चेत न रहा [कि यह तापस मुनि है या कालकेतु राक्षस]। उसने तुरंत एक लाख उत्तम ब्राह्मणों को कुटुम्ब सहित निमन्त्रण दे दिया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “प्रतापभानु की कथा” प्रकरण का दोहा १७२ है। इस प्रकरण में राजा प्रतापभानु के छल द्वारा विपथित होने और ब्राह्मण-शाप से उनके विनाश का वर्णन है।
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प्रतापभानु की कथा