जरा मरन दुख रहित तनु समर
जरा मरन दुख रहित तनु समर
दोहा १६४ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ। एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ॥ १६४ ॥
अर्थ
मेरा शरीर वृद्धावस्था, मृत्यु और दुःख से रहित हो जाय; मुझे युद्ध में कोई जीत न सके और पृथ्वी पर मेरा सौ कल्प तक एकछत्र, रिपुहीन राज्य हो।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “प्रतापभानु की कथा” प्रकरण का दोहा १६४ है। इस प्रकरण में राजा प्रतापभानु के छल द्वारा विपथित होने और ब्राह्मण-शाप से उनके विनाश का वर्णन है।
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प्रतापभानु की कथा